SIR West Bengal: पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। भले ही चुनाव आयोग ने अब तक औपचारिक रूप से बंगाल में SIR शुरू करने की घोषणा नहीं की है, लेकिन संकेत स्पष्ट हैं कि प्रक्रिया जल्द शुरू हो सकती है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज कुमार अग्रवाल ने इसके लिए तैयारियां तेज कर दी हैं।

चुनाव आयोग ने मांगी रिपोर्ट, नियुक्तियों पर ज़ोर
चुनाव आयोग ने सीईओ कार्यालय को निर्देशित किया है कि वह 29 अगस्त शाम 5 बजे तक राज्य में निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) और सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (AERO) की रिक्तियों पर रिपोर्ट पेश करे। बंगाल में फिलहाल 15-16 ERO पद और 500 से अधिक AERO पद खाली हैं।

इन्हीं नियुक्तियों को लेकर सीईओ मनोज अग्रवाल ने राज्य के मुख्य सचिव मनोज पंत को पत्र लिखा है और कहा है कि नियुक्तियां तत्काल की जाएं ताकि SIR की प्रक्रिया सुचारु रूप से पूरी हो सके।
बिहार के बाद बंगाल की बारी?
बिहार में SIR की प्रक्रिया शुरू होने के बाद राजनीतिक तूफान मच गया है। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने “वोटर अधिकार यात्रा” निकालकर इसका विरोध किया है और इसे “वोट चोरी” का ज़रिया बताया है। अब बंगाल में भी SIR लागू होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं, खासकर इसलिए क्योंकि राज्य में 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं। सूत्रों की मानें तो चुनाव आयोग पहले उन पांच राज्यों में SIR शुरू करना चाहता है, जहां 2026 में विधानसभा चुनाव हैं पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और असम।
ममता बनर्जी का कड़ा विरोध
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने SIR का खुला विरोध किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया बैकडोर से एनआरसी (NRC) लागू करने की साजिश है। ममता ने इसे भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत बताया और कहा कि इससे गरीबों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के मताधिकार पर संकट खड़ा हो सकता है।
चुनाव आयोग की सफाई और कानून
हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR एक नियमित प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। 2023 में आयोग ने कई राज्यों में मतदाता पुनरीक्षण को प्राथमिकता देने की बात कही थी। पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर माहौल गर्म है। एक तरफ चुनाव आयोग इसकी प्रशासनिक तैयारियों में जुटा है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों के बीच इसे लेकर मतभेद गहराते जा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा बंगाल की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकता है।










