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BJP Internal Politics: नितिन नबीन की एंट्री से योगी-शाह की राह कितनी मुश्किल? मोदी के बाद कौन बनेगा प्रधानमंत्री?

BJP Internal Politics: भारतीय जनता पार्टी ने जब से नितिन नबीन को अपना नया राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया है, तब से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। हर कोई इस पहेली को सुलझाने में लगा है कि आखिर दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी, जिसके पास 10 करोड़ से अधिक समर्पित कार्यकर्ता हैं, उसने एक ऐसे चेहरे को कमान क्यों सौंपी जो राष्ट्रीय स्तर पर बहुत अधिक चर्चित नहीं था। विशेष रूप से तब, जब आने वाले समय में असम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और नितिन नबीन का इन राज्यों से कोई सीधा क्षेत्रीय या भाषाई जुड़ाव नहीं है। उनकी नियुक्ति ने कई स्थापित समीकरणों को धता बता दिया है।

जातिगत समीकरण और कोर वोटर: क्या सवर्ण चेहरे से सधेगी चुनावी बिसात?

नितिन नबीन कायस्थ समाज से ताल्लुक रखते हैं, जो कि हिंदू समाज की सवर्ण श्रेणी में आता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सवर्ण मतदाता पहले से ही भाजपा का ‘कोर वोटर’ या आधार वोट बैंक माना जाता है। सामान्यतः ऐसी नियुक्तियों में पार्टियां अन्य वर्गों (OBC या दलित) को लुभाने के लिए किसी नए सामाजिक समीकरण वाले चेहरे को आगे लाती हैं, लेकिन भाजपा ने यहाँ लीक से हटकर फैसला लिया है। अब सियासी फिजाओं में यह सुगबुगाहट तेज हो गई है कि इस नियुक्ति के पीछे का मकसद केवल संगठन चलाना नहीं, बल्कि भविष्य की एक बहुत बड़ी योजना का हिस्सा है।

विश्व दीपक का विश्लेषण: 2029 के लोकसभा चुनाव की बिसात और ‘शतरंज का प्यादा’

वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार विश्व दीपक ने इस नियुक्ति के पीछे की एक अत्यंत दिलचस्प और गूढ़ कहानी बयां की है। उन्होंने अपने एक हालिया ब्लॉग में लिखा है कि नितिन नबीन असल में उस विशाल राजनीतिक शतरंज के एक ‘छोटे से प्यादे’ मात्र हैं, जिसकी बिसात पर 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले एक बहुत बड़ा खेल खेला जाने वाला है। उनके अनुसार, यह खेल किसी राज्य के चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य यह तय करना है कि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद देश और पार्टी की कमान किसके हाथ में होगी?’

अमित शाह बनाम योगी आदित्यनाथ: मोदी की विरासत के असली दावेदार कौन?

इस राजनीतिक खेल के दो सबसे मुख्य खिलाड़ी वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ माने जा रहे हैं। विश्व दीपक के अनुसार, पिछले कुछ समय में अमित शाह की बॉडी लैंग्वेज, मीडिया से उनके संवाद का तरीका और जनता के बीच उनकी बढ़ती सक्रियता यह संकेत दे रही है कि वे स्वयं को मोदी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में पेश कर रहे हैं। मोदी के सबसे पुराने और भरोसेमंद साथी होने के नाते उनका दावा बेहद मजबूत नजर आता है। दूसरी ओर, योगी आदित्यनाथ हैं, जो स्वयं को भाजपा और संघ की ‘हिंदुत्व वाली विरासत’ का असली और निर्विवाद चेहरा मानते हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि वैचारिक स्पष्टता के मामले में उन्हें कोई चुनौती नहीं दे सकता।

संगठन बनाम हिंदुत्व: भाजपा के भीतर भविष्य का वैचारिक अंत:संघर्ष

आने वाले वर्षों में भाजपा के भीतर एक बड़ा अंत:संघर्ष देखने को मिल सकता है। यह संघर्ष ‘मोदी की विरासत’ (संगठनात्मक और प्रशासनिक निरंतरता) बनाम ‘हिंदुत्व की शुद्ध सियासत’ के बीच होने की संभावना है। जहाँ अमित शाह संगठन की ताकत और मोदी के विजन को आगे बढ़ाने का प्रतीक हैं, वहीं योगी आदित्यनाथ उस उग्र हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे संघ का एक बड़ा वर्ग पसंद करता है। इसी खींचतान के बीच अध्यक्ष पद की कुर्सी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि चुनाव के समय टिकट वितरण और संगठनात्मक निर्णयों में अध्यक्ष की भूमिका निर्णायक होती है।

नितिन नबीन का ‘जीरो से हीरो’ बनने का सफर और अंडमान की वो गुप्त बैठक

नितिन नबीन के बारे में यह कहा जा रहा है कि उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका ‘जनाधार विहीन’ होना ही बन गई है। पत्रकार विश्व दीपक लिखते हैं कि राजनीति में कई बार नगण्य होना सबसे बड़ी योग्यता बन जाता है ताकि वह किसी बड़े गुट के लिए खतरा न बने। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके नाम पर अंतिम सहमति पिछले महीने अंडमान में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और अमित शाह के बीच हुई एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान बनी थी। उन्हें एक ऐसे चेहरे के रूप में देखा जा रहा है जो विवादों से दूर रहकर आलाकमान के निर्देशों का अक्षरशः पालन कर सके।

कूमी कपूर का दावा: गुजराती लॉबी और संघ के बीच की रस्साकशी

एक और वरिष्ठ पत्रकार कूमी कपूर ने इस नियुक्ति पर रोशनी डालते हुए लिखा है कि अमित शाह संभवतः धर्मेंद्र प्रधान या भूपेंद्र यादव जैसे कद्दावर नेताओं को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। लेकिन आरएसएस की मंशा थी कि ‘गुजराती लॉबी’ के बाहर का कोई व्यक्ति इस पद पर आए। अंततः नितिन नबीन के नाम पर मुहर लगी। हालांकि, कइयों का मानना है कि नबीन भले ही बिहार से हों, लेकिन उनकी कार्यशैली और वफादारी पूरी तरह से मोदी-शाह की जोड़ी के प्रति है। ऐसे में वे संगठन में वही करेंगे जो शीर्ष नेतृत्व चाहेगा।

योगी आदित्यनाथ के लिए बढ़ी चुनौतियां: क्या राह होगी और भी मुश्किल?

नितिन नबीन की नियुक्ति के बाद यह माना जा रहा है कि ‘मोदी के बाद कौन?’ की रेस में योगी आदित्यनाथ को अब और अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। संगठन पर पकड़ मजबूत करने के लिहाज से यह नियुक्ति उनके लिए एक नई चुनौती पेश कर सकती है। फिलहाल ये सभी राजनीतिक कयास और चर्चाएं हैं, लेकिन जिस तरह से भाजपा के भीतर गोटियां सेट की जा रही हैं, उसने भविष्य की राजनीति को बेहद रोमांचक बना दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि नितिन नबीन किस तरह से पार्टी के अंतर्विरोधों को संभालते हैं और 2029 की राह तैयार करते हैं।

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