Ebola Virus
Ebola Virus : विश्व स्वास्थ्य संगठन () द्वारा इबोला वायरस को ‘ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी’ घोषित किया जा चुका है, जिसका सीधा मतलब यह है कि यह खतरनाक वायरस पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा संकट बन सकता है। लेकिन इस बीच एक बेहद हैरान करने वाली बात सामने आई है कि इस जानलेवा वायरस की प्रामाणिक वैक्सीन बाजार में पहले से मौजूद है। इसके बावजूद वैश्विक स्तर पर इसे लेकर कड़ा अलर्ट जारी किया गया है और हाल ही में इससे 100 से अधिक लोगों की दर्दनाक मौतें भी दर्ज हो चुकी हैं। आखिर टीका उपलब्ध होने के बाद भी इबोला का खतरा इतना ज्यादा क्यों बना हुआ है? इस गंभीर विषय की गहराई को समझने के लिए हमने स्वास्थ्य विशेषज्ञों और महामारी विज्ञानियों से खास बातचीत की है।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, इबोला की बीमारी ‘ऑर्थोएबोलावायरस’ () नाम के वायरसों के एक बेहद आक्रामक समूह के कारण फैलती है। यह वायरस मानव शरीर में प्रवेश करते ही एक गंभीर रक्तस्रावी बीमारी को जन्म देता है, जिसका यदि समय पर सही इलाज न मिले, तो मरीज की मृत्यु निश्चित हो जाती है। इस जानलेवा वायरस की खोज सबसे पहले साल 1976 में कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) में इबोला नदी के पास हुई थी, जिसके नाम पर इसका नामकरण किया गया। यह वायरस मुख्य रूप से उप-सहारा अफ्रीका के देशों के घने जंगलों और सुदूर ग्रामीण इलाकों में पाया जाता है, जहां से यह इंसानी बस्तियों में फैलता है।
इबोला को पृथ्वी पर पाए जाने वाले अब तक के सबसे खतरनाक और संक्रामक वायरसों की श्रेणी में शीर्ष पर रखा जाता है। अगर इसकी तुलना कोरोना वायरस (कोविड-19) से की जाए, तो इबोला में मृत्युदर कोविड के मुकाबले कई गुना अधिक है। स्वास्थ्य आंकड़ों के मुताबिक, इबोला से संक्रमित होने वाले मरीजों में मृत्युदर रिकॉर्ड 80 से 90 फीसदी तक होती है, यानी इससे ग्रसित होने वाले प्रत्येक 10 में से 8 या 9 मरीजों की जान चली जाती है। यह घातक बीमारी मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खून, शरीर के उत्सर्जित तरल पदार्थों (जैसे लार, पसीना) या संक्रमित जंगली जानवरों (जैसे चमगादड़, बंदर) के सीधे संपर्क में आने से फैलती है। इस बीमारी के अंतिम चरण में मरीज के शरीर के अंदरूनी अंगों से भारी ब्लीडिंग () होने लगती है, जो अंततः मौत का कारण बनती है।
भारत के सुप्रसिद्ध महामारी विशेषज्ञ डॉ. जुगल किशोर ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाते हुए बताया कि हर दूसरे वायरस की तरह इबोला वायरस के भी समय के साथ कई अलग-अलग स्ट्रेन और म्यूटेशन सामने आ चुके हैं। हालांकि, अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन () द्वारा स्वीकृत इबोला की एक बेहद प्रभावी वैक्सीन ‘जैराजेन्नी’ () चिकित्सा जगत में मौजूद है, लेकिन यह वैक्सीन केवल इबोला के ‘जायरे स्ट्रेन’ पर ही कारगर है। डॉ. किशोर के अनुसार, वर्तमान में जो नए मामले सामने आ रहे हैं, वे इबोला के एक अन्य बेहद खतरनाक ‘बुंदीबुग्यो’ () स्ट्रेन के हैं। चिंता की बात यह है कि इस नए स्ट्रेन के खिलाफ अभी तक दुनिया में कोई भी प्रमाणित टीका या दवा उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण मौतें तेजी से बढ़ रही हैं।
वैक्सीन होने के बाद भी मौतों का आंकड़ा बढ़ने का एक दूसरा और सबसे बड़ा व्यावहारिक कारण अफ्रीका महाद्वीप की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति है। अफ्रीका के कई दूरदराज के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं, अस्पताल और दवाइयां बेहद कमजोर या न के बराबर हैं। इन घने जंगलों वाले क्षेत्रों में परिवहन के साधनों की भारी कमी होने के कारण आपातकाल के समय सही समय पर वैक्सीन की खेप और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम को संक्रमित मरीजों तक पहुंचाना प्रशासन के लिए एक बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य साबित होता है। उचित देखभाल न मिलने से संक्रमण हवा की रफ्तार से फैलता है।
अगर कोई व्यक्ति इबोला वायरस की चपेट में आता है, तो उसके शरीर में कुछ प्रमुख लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इनमें अचानक बहुत तेज बुखार आना, अत्यधिक शारीरिक थकान व कमजोरी महसूस होना, लगातार उल्टियां होना, जोड़ों और मांसपेशियों में तेज दर्द होना और बीमारी बढ़ने पर नाक, मसूड़ों या मल-मूत्र के रास्ते ब्लीडिंग होना शामिल है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस जानलेवा बीमारी से बचने का एकमात्र उपाय केवल सावधानी है। लोगों को सलाह दी जाती है कि वे उन प्रभावित देशों या इलाकों की यात्रा करने से पूरी तरह बचें जहां इबोला के सक्रिय मामले मिल रहे हैं। इसके साथ ही, किसी भी संदिग्ध या संक्रमित मरीज और बीमार जानवरों के सीधे संपर्क में आने से खुद को दूर रखें।
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