Mother in Religions: मां केवल एक शब्द नहीं, बल्कि त्याग, ममता, प्रेम और बलिदान का दूसरा नाम है। चाहे किसी भी धर्म या संस्कृति की बात हो, मां का दर्जा हमेशा सर्वोच्च माना गया है। वह न सिर्फ एक बच्चे को जन्म देती है, बल्कि उसे पालती-पोसती, गढ़ती और समाज का बेहतर नागरिक बनाती है। हर धर्म मां की सेवा और सम्मान को सबसे बड़ा धर्म मानता है।

इस्लाम में मां का दर्जा
इस्लाम में मां की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि पैगंबर मोहम्मद (स.अ.) ने फरमाया: “जन्नत मां के कदमों के नीचे है।” एक हदीस के अनुसार, जब एक शख्स ने पूछा कि अच्छे व्यवहार का सबसे ज्यादा हकदार कौन है? रसूल (स.अ.) ने तीन बार कहा: “तुम्हारी मां” और चौथी बार कहा “तुम्हारे पिता।”
इससे साफ है कि इस्लाम में मां का 75% दर्जा, और पिता का 25% माना गया है।

हिंदू धर्म में मां का महत्व
हिंदू धर्म में मां को देवी तुल्य माना गया है। “मातृदेवो भव” का अर्थ है – “मां को देवता समझो।” शास्त्रों में कहा गया है कि मां की सेवा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। मां का आशीर्वाद ईश्वर के आशीर्वाद के समान होता है।
ईसाई धर्म में मां का स्थान
ईसाई धर्म में भी मां की सेवा और सम्मान को ईश्वर की इच्छा माना गया है। बाइबिल में बच्चों को सिखाया गया है कि वे अपनी मां से सीखें, उनकी सेवा करें और सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करें।
बौद्ध धर्म में मां की भक्ति
बौद्ध धर्म में माता-पिता की सेवा को पुण्य कर्म कहा गया है। गौतम बुद्ध ने कहा था कि माता-पिता की सेवा करना एक ऐसा कार्य है जिससे व्यक्ति धार्मिक और नैतिक उन्नति करता है। मां की देखभाल करने वाला बच्चा करुणा और दया के मार्ग पर चलता है।
जैन धर्म में मां की सेवा का महत्व
जैन धर्म में भी माता-पिता के प्रति कर्तव्यपालन को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। मां की खुशियों का ध्यान रखना, उनकी जरूरतें पूरी करना और उनका मार्गदर्शन मानना आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग बताया गया है।
मां हर धर्म में ईश्वर के सबसे पवित्र रूप के समान मानी गई है। चाहे इस्लाम हो या हिंदू धर्म, ईसाई हो या बौद्ध, या फिर जैन धर्म – हर जगह मां को संवेदनाओं, संस्कारों और सद्गुणों की जननी माना गया है।मां का दिल हर समय अपने बच्चों के लिए धड़कता है। उनका त्याग, प्रेम और आशीर्वाद ही किसी भी समाज और सभ्यता की जड़ें मजबूत करता है।









