131st Amendment
131st Amendment : संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र का समापन एक बड़े राजनीतिक उलटफेर के साथ हुआ। लंबे समय से प्रतीक्षित महिला आरक्षण 131वां संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका। शुक्रवार शाम को हुई इस ऐतिहासिक वोटिंग में विधेयक को वह समर्थन नहीं मिला जिसकी उम्मीद की जा रही थी। मतदान के बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने परिणामों की घोषणा करते हुए बताया कि सदन में कुल 528 वोट पड़े, जिनमें से विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट दर्ज किए गए। किसी भी संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए सदन में उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में 352 वोट था। सरकार इस जादुई आंकड़े से 54 वोट पीछे रह गई, जिसके कारण बिल गिर गया।
सदन में चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने परिसीमन की आवश्यकता पर जोर देते हुए महत्वपूर्ण तर्क रखे। उन्होंने मौजूदा चुनावी ढांचे की विसंगतियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि वर्तमान में एक सांसद कहीं 49 लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है, तो कहीं यह संख्या मात्र 60 हजार है। शाह ने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी आबादी वाले क्षेत्र का सांसद अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कैसे कर पाता होगा? उन्होंने स्पष्ट किया कि मतदाताओं की अपेक्षाएं पूरी करने और संसदीय क्षेत्रों के बीच संतुलन बनाने के लिए संविधान में समय-समय पर परिसीमन का प्रावधान किया गया है, और महिला आरक्षण को इसी व्यापक सुधार का हिस्सा होना चाहिए।
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस विधेयक का पुरजोर विरोध करते हुए इसे सरकार का एक “छलावा” करार दिया। उन्होंने मतदान से पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि यह बिल सदन में गिर जाएगा। राहुल ने आरोप लगाया कि सरकार इस बिल के माध्यम से वास्तव में महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं करना चाहती, बल्कि इसके पीछे एक गुप्त राजनीतिक एजेंडा है। उन्होंने दावा किया कि इस प्रस्ताव के जरिए देश के इलेक्टोरल मैप (चुनावी मानचित्र) को बदलने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपा राजनीतिक गणित है, जिसे जनता से छिपाया जा रहा है।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी महिलाओं को आरक्षण देने के सैद्धांतिक रूप से खिलाफ नहीं है, लेकिन मौजूदा स्वरूप में इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने मुख्य आपत्ति परिसीमन और ओबीसी कोटे की अनुपस्थिति पर जताई। प्रियंका ने कहा कि पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन करना और ओबीसी वर्ग की महिलाओं को इसमें शामिल न करना गलत है। उन्होंने इस बिल के गिरने को लोकतंत्र और देश की एकता के लिए एक “बड़ी जीत” बताया, क्योंकि उनके अनुसार यह विधेयक संविधान की मूल भावना और संरचना पर हमला था।
विधेयक के गिरने के बाद अब देश में एक नई बहस छिड़ गई है। जहाँ सरकार इसे महिलाओं को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने की दिशा में एक गंभीर प्रयास बता रही थी, वहीं विपक्ष ने इसे रणनीतिक बदलाव और सत्ता के केंद्रीकरण की कोशिश के रूप में पेश किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बावजूद विपक्षी दलों की एकजुटता ने सरकार के इस कदम को रोक दिया। अब देखना यह होगा कि क्या भविष्य में सरकार इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने के लिए कोई नया रास्ता अपनाती है या यह मुद्दा आगामी चुनावों के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार बनेगा। फिलहाल, 50 प्रतिशत आबादी के लिए संसद की दहलीज तक पहुँचने का रास्ता और लंबा हो गया है।
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