Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में गुरुवार से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आधिकारिक एंट्री हो गई है। बीजेपी के सबसे ‘हार्ड हिंदुत्व’ चेहरे के रूप में पहचाने जाने वाले योगी आदित्यनाथ आज बिहार में दो बड़ी जनसभाएं करेंगे। उनकी ये रैलियां राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जा रही हैं, क्योंकि इन्हें ‘ध्रुवीकरण की रणनीति’ के तहत देखा जा रहा है।

सहरसा: ओवैसी को काउंटर करने की चाल
योगी आदित्यनाथ की दूसरी रैली सहरसा में होगी, जहाँ वह बीजेपी प्रत्याशी डॉ. आलोक रंजन के समर्थन में वोट मांगेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों की सबसे ज्यादा नजर इसी रैली पर टिकी है।

सहरसा का इलाका कोशी-सीमांचल बेल्ट के करीब है, एक ऐसा क्षेत्र जहाँ मुस्लिम वोटरों की तादाद ज्यादा है और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM पूरी सक्रियता से मैदान में उतर चुकी है। महागठबंधन से सीटें न मिलने के बाद ओवैसी की एंट्री ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।
- रणनीति: बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ के माध्यम से अपने समर्थक वर्ग (कोर वोटर) को हिंदुत्व के मुद्दे पर एकजुट करने की कोशिश की है। चूंकि बीजेपी ने अब तक जारी अपनी किसी भी सूची में मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है, योगी की रैलियाँ धार्मिक ध्रुवीकरण का असर सीधा वोटों पर डालने की कोशिश है, और यह ओवैसी के खिलाफ एक ‘नैरेटिव बैटल’ भी है।
दानापुर: बाहुबली को कानून-व्यवस्था से चुनौती
योगी आदित्यनाथ की पहली रैली पटना के दानापुर विधानसभा क्षेत्र में हो रही है। यहाँ वह बीजेपी प्रत्याशी रामकृपाल यादव के समर्थन में सभा करेंगे।दानापुर सीट पर रामकृपाल यादव के सामने बाहुबली नेता रीतलाल यादव की कड़ी चुनौती है। योगी आदित्यनाथ अपनी सख्त कानून व्यवस्था और बुलडोजर मॉडल के लिए जाने जाते हैं।
- रणनीति: बीजेपी योगी की छवि का उपयोग कर रीतलाल यादव को एक सख्त संदेश देने की कोशिश कर रही है। यह बाहुबल के सामने कानून-व्यवस्था के मुद्दे को मजबूती से खड़ा करने का प्रयास है।
आगे 20 से अधिक रैलियों का कार्यक्रम
बीजेपी की योजना के अनुसार, योगी आदित्यनाथ आने वाले दिनों में बिहार में 20 से अधिक चुनावी रैलियां करेंगे। पार्टी सूत्रों का कहना है कि उनकी लोकप्रियता और ‘सख्त’ छवि उन सीटों पर बीजेपी के लिए वोट जुटाने वाला फैक्टर बन सकती है, जहाँ मुकाबला त्रिकोणीय या चौकोणीय है।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि योगी की रैलियों का मकसद केवल वोट बैंक मजबूत करना नहीं है, बल्कि एक बड़ा वैचारिक संदेश देना भी है कि पार्टी अपने हिंदुत्व एजेंडे से पीछे नहीं हट रही है।











