Arabian Skate : Arabian Sea में वैज्ञानिकों की बड़ी खोज, 600 मीटर गहराई में मिली स्केट मछली की नई प्रजाति

अरब सागर की 400 से 600 मीटर गहराई में वैज्ञानिकों को ऐसी स्केट मछली मिली, जिसकी पहचान चार दशक तक नहीं हो सकी थी। ZSI, ICAR-CMFRI और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने शोध के बाद इसे नई प्रजाति घोषित किया। आखिर समुद्र की गहराइयों में छिपी इस मछली की खासियत क्या है?

Arabian Skate : भारत के समुद्री जैव-विविधता अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) के वैज्ञानिकों ने ICAR-केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग से अरब सागर में गहरे समुद्र में रहने वाली स्केट मछली की एक नई प्रजाति की पहचान की है। यह खोज केरल तट के पास समुद्री सर्वेक्षण के दौरान हुई है।

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नई प्रजाति का रखा गया वैज्ञानिक नाम

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, इस नई समुद्री प्रजाति का वैज्ञानिक नाम डिप्टुरस धृतिया (Dipturus dhritiya) रखा गया है। इसे सामान्य रूप से अरबियन स्केट कहा जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह खोज भारत के समुद्री क्षेत्रों में मौजूद जैव-विविधता की व्यापकता को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

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गहरे महासागर मिशन के तहत हुई खोज

यह प्रजाति पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के महत्वाकांक्षी डीप ओशन मिशन के अंतर्गत चल रहे समुद्री सर्वेक्षण के दौरान मिली। यह अध्ययन ‘भारत के गहरे समुद्री कॉन्ड्रिक्थियंस: वर्गीकरण, वितरण, जीव विज्ञान और वर्तमान स्थिति’ परियोजना का हिस्सा है। इसका उद्देश्य गहरे समुद्र में पाई जाने वाली शार्क, रे और स्केट जैसी प्रजातियों की पहचान और उनके जैविक अध्ययन को आगे बढ़ाना है।

600 मीटर तक गहराई में मिले नमूने

शोधकर्ताओं के मुताबिक, डिप्टुरस धृतिया की अधिकतम ज्ञात लंबाई करीब 131.5 सेंटीमीटर तक है। इसकी पहचान करने वाली प्रमुख विशेषताओं में पूंछ पर मौजूद कांटों की पांच स्पष्ट कतारें शामिल हैं। वैज्ञानिकों को इसके नमूने केरल तट और वेज बैंक क्षेत्र के आसपास समुद्र की 400 से 600 मीटर गहराई में मिले।

आनुवंशिक जांच से हुई प्रजाति की पुष्टि

नई स्केट प्रजाति की वैज्ञानिक पहचान को पुख्ता करने के लिए शोधकर्ताओं ने इसके पूरे माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम का अनुक्रमण किया। आनुवंशिक विश्लेषण में सामने आया कि यह अपने निकट संबंधी ट्रावनकोर स्केट यानी डिप्टुरस जोहानिसडेविसी से अलग है। दोनों प्रजातियों के आनुवंशिक अनुक्रमों में करीब 3.8 से 4.7 प्रतिशत तक अंतर पाया गया।

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चार दशक तक दूसरी प्रजाति समझी जाती रही

वैज्ञानिकों ने बताया कि डिप्टुरस धृतिया की वास्तविक पहचान होने से पहले इसे चार दशक से अधिक समय तक डिप्टुरस स्प्रिंगेरी माना जाता रहा। इस दौरान गहरे समुद्र में झींगा पकड़ने वाले व्यावसायिक ट्रॉलर के जाल में यह प्रजाति अनजाने में पकड़ी जाती रही। नई पहचान से अब इसके संरक्षण और आबादी के अध्ययन में मदद मिल सकती है।

पहली महिला निदेशक के सम्मान में नाम

नई प्रजाति का नाम ZSI की पहली महिला निदेशक डॉ. धृति बनर्जी के सम्मान में डिप्टुरस धृतिया रखा गया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन काम करने वाले भारतीय प्राणी सर्वेक्षण का मुख्यालय कोलकाता में है। डॉ. बनर्जी ने कहा कि गहरे समुद्र का बड़ा हिस्सा अभी भी वैज्ञानिक खोज से अछूता है और प्रत्येक समुद्री सर्वेक्षण नई जैव-विविधता को समझने का अवसर देता है।

शार्क और रे प्रजातियों पर बढ़ता खतरा

डॉ. बनर्जी के अनुसार, गहरे समुद्र में रहने वाली शार्क, रे और स्केट प्रजातियां अत्यधिक मत्स्य दोहन के प्रति काफी संवेदनशील होती हैं। इनका प्रजनन अपेक्षाकृत धीमा होता है और आबादी को दोबारा सामान्य स्थिति में आने में लंबा समय लग सकता है। व्यावसायिक मछली पकड़ने के दौरान इनके अनजाने में पकड़े जाने का खतरा भी बना रहता है।

संरक्षण के लिए नई पहचान बेहद महत्वपूर्ण

वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्री प्रजातियों की सही समय पर पहचान उनके संरक्षण की प्रभावी रणनीति तैयार करने के लिए जरूरी है। यदि किसी प्रजाति की आबादी में गिरावट शुरू होने के बाद उसकी पहचान होती है, तो संरक्षण के प्रयास मुश्किल हो सकते हैं। इसलिए नई प्रजाति की पहचान समुद्री पारिस्थितिकी और संरक्षण दोनों के लिहाज से अहम मानी जा रही है।

शोध दल में भारतीय और अमेरिकी वैज्ञानिक शामिल

इस महत्वपूर्ण अध्ययन में ZSI के डॉ. केके बिनीश और अनिल कासीनाथ, ICAR-केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान के अखिलेश केवी तथा अमेरिका के डॉ. डेविड ए. एबर्ट शामिल रहे। शोधकर्ताओं ने इसी अभियान के दौरान भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र में कोल्लम स्लोप को महत्वपूर्ण शार्क एवं रे क्षेत्र के रूप में भी पहचानने और उसका मानचित्रण करने का काम किया।

आगे भी नई समुद्री प्रजातियों की खोज की उम्मीद

ZSI के अनुसार, डीप ओशन मिशन के तहत भारतीय समुद्री क्षेत्र में शार्क, रे और स्केट जैसी प्रजातियों के वर्गीकरण तथा आनुवंशिक अध्ययन लगातार जारी रहेंगे। वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र की गहराइयों में अभी कई ऐसी प्रजातियां मौजूद हो सकती हैं, जिनकी वैज्ञानिक पहचान नहीं हुई है। आने वाले समय में समुद्री सर्वेक्षणों के जरिए भारत की समुद्री जैव-विविधता से जुड़े कई और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने की उम्मीद है।

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Chandan Das

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