Manoj Naravane Galwan Clash: पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (सेवानिवृत्त) ने कहा है कि गलवान घाटी में हुई झड़प ने भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की जटिलता को स्पष्ट कर दिया। उनके मुताबिक, इस पुराने विवाद का सैन्य समाधान व्यावहारिक विकल्प नहीं है और इसे बातचीत तथा कूटनीतिक संवाद के जरिए सुलझाने की कोशिश की जानी चाहिए। पुणे में गुरुवार को आईटी और बैंकिंग क्षेत्र के पेशेवरों की एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने सीमा पर टकराव से मिले सबक और आगे की राह पर अपने विचार रखे।
भारत ने एकतरफा सीमा बदलाव का किया विरोध
जनरल नरवणे ने कहा कि गलवान में टकराव के दौरान भारत अपनी स्थिति पर मजबूती से कायम रहा। उन्होंने जोर दिया कि ताकत के इस्तेमाल से एकतरफा तरीके से सीमा बदलने की कोशिशों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, भारत ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी पक्ष द्वारा सैन्य दबाव के जरिए यथास्थिति बदलना उचित नहीं है। नरवणे ने कहा कि सैन्य विकल्प को सीमा विवाद सुलझाने का रास्ता नहीं माना जाना चाहिए और बातचीत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
बॉर्डर और बाउंड्री के बीच क्या है अंतर?
पूर्व सेना प्रमुख ने भारत और चीन के बीच सीमा संबंधी विवाद को समझाने के लिए ‘बॉर्डर’ और ‘बाउंड्री’ के बीच अंतर बताया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त बॉर्डर स्पष्ट रूप से निर्धारित होती है, जबकि बाउंड्री का अर्थ ऐसी सीमा-रेखा से हो सकता है, जिसके सटीक मार्ग और स्थिति पर संबंधित पक्षों में सहमति नहीं है। नरवणे के अनुसार, भारत और चीन के बीच लगभग 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा-रेखा को लेकर मतभेद हैं। दोनों देशों की इस बात पर अलग-अलग समझ है कि वास्तविक रेखा किन क्षेत्रों से होकर गुजरती है।
जिन इलाकों में मतभेद, वहां टकराव की आशंका
नरवणे ने बताया कि जब दो देशों के बीच सीमा-रेखा के स्थान को लेकर सहमति नहीं होती, तो संबंधित क्षेत्रों में गश्त और गतिविधियों के दौरान टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। उन्होंने गलवान की घटना को भी इसी व्यापक विवाद से जुड़ा उदाहरण बताया। उनके मुताबिक, ऐसे मतभेदों को दूर करने के लिए संवाद और स्पष्ट समझ जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सीमा पर स्थायी शांति स्थापित करने के लिए सैन्य सतर्कता के साथ राजनयिक प्रयास भी लगातार जारी रहने चाहिए।
भारत-चीन विशेष प्रतिनिधियों की बातचीत महत्वपूर्ण
पूर्व सेना प्रमुख ने भारत और चीन के बीच विशेष प्रतिनिधियों के माध्यम से होने वाली वार्ता का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि चीन की ओर से विदेश मंत्री वांग यी और भारत की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल इस व्यवस्था से जुड़े हैं। नरवणे के अनुसार, यह बातचीत पहले भी होती रही है, हालांकि बीच में लंबे समय तक इसमें ठहराव आया था। अब वार्ता दोबारा शुरू होने को उन्होंने विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
डिलिमिटेशन को बताया सीमा विवाद सुलझाने की दिशा में कदम
नरवणे ने हालिया बातचीत में ‘डिलिमिटेशन’ यानी सीमा-निर्धारण शब्द का उल्लेख होने को भी अहम बताया। उनके अनुसार, किसी विवादित सीमा को स्पष्ट रूप से निर्धारित करने की प्रक्रिया विवाद सुलझाने की दिशा में शुरुआती कदम हो सकती है। हालांकि, वास्तविक प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों देश बातचीत के जरिए सीमा की स्थिति और संबंधित मतभेदों पर कितनी सहमति बना पाते हैं।
गलवान से भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को मिला बल
गलवान झड़प से मिले सबक पर बात करते हुए नरवणे ने कहा कि इस घटना के बाद सैन्य, राजनयिक और राजनीतिक स्तर पर भारत की स्थिति मजबूत हुई। उन्होंने भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी का भी उल्लेख किया। उनके विचार में, इस पूरे घटनाक्रम का बड़ा सबक यह है कि सीमा पर दृढ़ता बनाए रखने के साथ विवादों को सुलझाने के लिए बातचीत और कूटनीति को भी प्राथमिकता देना जरूरी है।
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