Angomcha Bimol Akoijam : दिल्ली हाईकोर्ट ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रोफेसर और कांग्रेस सांसद अंगोमचा बिमोल अकोइजम को बड़ी राहत दी है। सोमवार को अदालत ने विश्वविद्यालय के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसके तहत यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के बाद उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। इस आदेश के बाद फिलहाल उनकी बर्खास्तगी पर कानूनी रोक लग गई है।
न्यायमूर्ति अनूप भंभानी की पीठ ने अकोइजम की याचिका पर सुनवाई करते हुए JNU प्रशासन को नोटिस जारी किया है। सांसद ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए अदालत से राहत मांगी थी। मामले में अगली सुनवाई जनवरी में निर्धारित की गई है। हाईकोर्ट के इस कदम को अकोइजम के लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत माना जा रहा है।

कौन हैं अंगोमचा बिमोल अकोइजम?
अंगोमचा बिमोल अकोइजम मणिपुर की इनर मणिपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस सांसद हैं। राजनीति में आने से पहले वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे। मई में उनके खिलाफ छात्राओं की ओर से शिकायतें सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कराई थी।

11 छात्राओं की शिकायतों के बाद हुई थी कार्रवाई
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कम से कम 11 छात्राओं ने अकोइजम के खिलाफ यौन उत्पीड़न से संबंधित शिकायतें दर्ज कराई थीं। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि वह मीटिंग या विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों के बहाने छात्राओं को परिसर में स्थित अपने सरकारी आवास पर बुलाते थे। आरोपों के अनुसार, इन मुलाकातों के दौरान उनके साथ अनुचित व्यवहार और यौन उत्पीड़न की कोशिश की गई।
हालांकि, ये शिकायतकर्ताओं की ओर से लगाए गए आरोप हैं। मामले में विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति यानी इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) ने जांच की थी। जांच के निष्कर्षों के आधार पर समिति ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की। इसके बाद JNU प्रशासन ने 9 अक्टूबर को उनकी सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया।

बर्खास्तगी और सरकारी आवास से बेदखली को दी चुनौती
अकोइजम ने हाईकोर्ट में अपनी सेवा समाप्ति के साथ-साथ विश्वविद्यालय परिसर में मिले सरकारी आवास से बेदखली के फैसले को भी चुनौती दी है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय ने कार्रवाई से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बर्खास्तगी की प्रक्रिया में निर्धारित कानूनी और प्रशासनिक नियमों का पालन नहीं किया गया।
सांसद के मुताबिक, विश्वविद्यालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों और JNU अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। उनका यह भी तर्क है कि सेवा समाप्त करने से पहले उन्हें आवश्यक नोटिस जारी नहीं किया गया। इसी आधार पर उन्होंने बर्खास्तगी के आदेश को कानूनी रूप से चुनौती दी है।
JNU प्रशासन ने क्या दिया था तर्क?
विश्वविद्यालय की ओर से जारी बर्खास्तगी आदेश पर कुलपति शांतिश्री डी. पंडित के हस्ताक्षर बताए गए हैं। आदेश में कहा गया था कि विश्वविद्यालय ने उचित प्रक्रिया का पालन किया और सेवा समाप्ति का निर्णय लेने से पहले आंतरिक जांच समिति के निष्कर्षों पर विचार किया। ICC की रिपोर्ट के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई थी।
मणिपुर की राजनीति में भी गरमाया मामला
अकोइजम की बर्खास्तगी का विवाद अब केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि मणिपुर की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है। बीजेपी की ओर से संसद में उनके इस्तीफे की मांग उठाई गई है। वहीं, कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सत्ताधारी दल यौन उत्पीड़न के आरोपों का राजनीतिक इस्तेमाल कर अपने सांसद को निशाना बना रहा है।
इस मुद्दे पर राज्य में उनके समर्थन और विरोध में प्रदर्शन भी हुए हैं। ऐसे राजनीतिक माहौल के बीच दिल्ली हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश काफी अहम माना जा रहा है। अब जनवरी में होने वाली सुनवाई में अदालत के सामने विश्वविद्यालय की दलीलें और सांसद की याचिका से जुड़े कानूनी पहलू रखे जाएंगे। फिलहाल, बर्खास्तगी पर रोक से अकोइजम को राहत मिली है, लेकिन मामले का अंतिम फैसला आना बाकी है।
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