Sua Dance Chhattisgarh : छत्तीसगढ़ अपनी अनूठी लोककला, लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों के लिए पूरे देश में अलग पहचान रखता है। यहां हर मौसम, त्योहार और खास अवसर के साथ कोई न कोई लोकपरंपरा जुड़ी हुई है। इन्हीं में सुआ गीत और नृत्य का विशेष महत्व है। खासकर दिवाली के आसपास इसकी रौनक गांवों से लेकर शहरों तक दिखाई देने लगती है। महिलाओं की टोलियां पारंपरिक छत्तीसगढ़ी गीत गाकर सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाती हैं।
तोते के नाम पर पड़ा सुआ नृत्य का नाम
छत्तीसगढ़ी भाषा में तोते को सुआ कहा जाता है। इसी पक्षी के नाम से इस पारंपरिक लोकगीत और नृत्य को सुआ नाच के नाम से जाना जाता है। इसकी तैयारियां आमतौर पर दशहरे या शरद पूर्णिमा के बाद शुरू हो जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पहले से ही इसकी तैयारी करने लगती हैं। दिवाली नजदीक आते ही सुआ गीतों की मधुर आवाज गांवों और घरों में सुनाई देने लगती है। जब महिलाएं समूह बनाकर पारंपरिक धुनों पर गीत गाती हैं, तो वातावरण पूरी तरह लोकसंस्कृति के रंग में रंग जाता है।

सुआ गीतों में छिपे होते हैं महिलाओं के मन के भाव
सुआ गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनके जरिए महिलाएं अपने मन की भावनाओं और जीवन के अनुभवों को भी व्यक्त करती हैं। लोकमान्यता के अनुसार, तोता महिलाओं का प्रिय पक्षी माना जाता है। वह इंसानों की तरह बोल भी सकता है, इसलिए उसे अपने मन की बात कहने का प्रतीक माना जाता है।इन गीतों में प्रेम, खुशी, इंतजार, बिछड़ने का दर्द और जीवन के कई भाव सुनाई देते हैं। विशेष रूप से करुण रस और विरह की भावना सुआ गीतों को भावनात्मक रूप से खास बनाती है। यही वजह है कि इनकी धुन और शब्द सुनने वालों के मन को छू जाते हैं।

पति और प्रेमी से दूरी का दर्द बयां करते हैं गीत
दिवाली के आसपास छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान धान की कटाई और मिंजाई जैसे कामों में व्यस्त रहते हैं। खेती-किसानी की जिम्मेदारियों के कारण पुरुषों को लंबे समय तक खेतों में समय बिताना पड़ता है। ऐसे में महिलाएं अपने पति या प्रेमी से दूर रहने की पीड़ा को सुआ गीतों के माध्यम से व्यक्त करती हैं।इन लोकगीतों में इंतजार और विरह की कहानियां सुनाई देती हैं। महिलाओं के भावनात्मक अनुभव और ग्रामीण जीवन की परिस्थितियां इन गीतों को खास बनाती हैं।
मिट्टी के तोते और जलते दीये के साथ होता है नृत्य
सुआ नृत्य की पारंपरिक तैयारी भी काफी आकर्षक होती है। महिलाएं लकड़ी या मिट्टी से बने तोते की प्रतिमा को बांस की टोकरी में रखती हैं। टोकरी में धान रखा जाता है और उसके पास एक दीपक जलाया जाता है। इसके बाद महिलाएं टोकरी के चारों ओर गोल घेरा बनाकर खड़ी होती हैं।वे तालियों की थाप पर एक साथ छत्तीसगढ़ी सुआ गीत गाती हैं और गोल घेरे में नृत्य करती हैं। सभी महिलाओं की एक जैसी लय, ताल और पारंपरिक गीत इस आयोजन को बेहद खास बना देते हैं।

दादी-नानी से नई पीढ़ी तक पहुंच रही परंपरा
सुआ नृत्य की विरासत पीढ़ियों से आगे बढ़ रही है। दादी और नानी से सीखकर बेटियां और पोतियां भी इस लोकपरंपरा को जीवित रख रही हैं। दिवाली के समय छोटी बच्चियां भी अपनी अलग टोली बनाकर पारंपरिक छत्तीसगढ़ी पोशाक पहनती हैं और घर-घर जाकर सुआ गीत गाती हैं।गीत सुनाने के बदले उन्हें धान, दूसरे अनाज और पैसे दिए जाते हैं। बच्चियां घर के लोगों को आशीर्वाद भी देती हैं। इस तरह सुआ नृत्य केवल एक कला नहीं, बल्कि सामुदायिक मेलजोल और आपसी अपनत्व का माध्यम भी है।
आदिवासी परंपराओं से जुड़ी है सुआ नृत्य की विरासत
सुआ नृत्य की जड़ें छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज, विशेष रूप से गोंड समुदाय की सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी मानी जाती हैं। सैकड़ों वर्षों से यह लोकनृत्य प्रदेश की पहचान का हिस्सा बना हुआ है। समय के साथ इसकी लोकप्रियता ग्रामीण इलाकों से निकलकर शहरों तक पहुंच गई है।बदलते दौर में इस सांस्कृतिक धरोहर को बचाए रखना बेहद जरूरी है। नई पीढ़ी को लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों से जोड़ने के साथ लोककलाकारों को भी प्रोत्साहन मिलना चाहिए, ताकि छत्तीसगढ़ की यह अनमोल विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचती रहे।

