UPI MDR Charge : डिजिटल पेमेंट करने वाले दुकानदारों और ग्राहकों के लिए UPI से जुड़ी एक नई व्यवस्था चर्चा में है। सितंबर 2026 में 2,000 रुपये से अधिक के UPI पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) लेनदेन पर 0.40 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने की घोषणा की गई थी। इसे 15 अक्टूबर से लागू किया जाना था, लेकिन नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने इसकी शुरुआत दिवाली के बाद तक टाल दी। इस प्रस्ताव के समर्थकों का तर्क है कि इससे UPI भुगतान व्यवस्था को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और टिकाऊ बनाने में मदद मिलेगी। उनका कहना है कि लगभग 96 प्रतिशत छोटे दैनिक लेनदेन इस शुल्क से बाहर रहेंगे। हालांकि, इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (ISB) के एक अध्ययन ने इस व्यवस्था के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है।
ISB की रिपोर्ट में 722 स्ट्रीट वेंडर्स पर हुआ सर्वे
इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस की यह रिपोर्ट 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 722 रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं पर किए गए सर्वेक्षण पर आधारित है। अध्ययन के मुताबिक, लगभग 70 प्रतिशत स्ट्रीट वेंडर्स अपने सप्लायर्स से थोक में सामान खरीदने के दौरान एक बार में 2,000 रुपये से अधिक का भुगतान करते हैं। ऐसे में प्रस्तावित MDR चार्ज का असर उनके रोजमर्रा के कारोबार पर पड़ सकता है। सर्वे में शामिल लगभग सभी विक्रेताओं ने आशंका जताई कि यदि सप्लायर्स UPI भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क मांगते हैं, तो वे डिजिटल पेमेंट छोड़कर नकद लेनदेन अपनाने को मजबूर हो सकते हैं।

10.4 प्रतिशत विक्रेताओं से पहले ही मांगा जाने लगा अतिरिक्त शुल्क
अध्ययन में एक और चिंताजनक तथ्य सामने आया है। सर्वेक्षण से महज 10 दिन पहले लगभग 10.4 प्रतिशत स्ट्रीट वेंडर्स ने बताया कि उनके सप्लायर्स ने UPI के माध्यम से भुगतान करने पर अतिरिक्त चार्ज लेना शुरू कर दिया था। इससे संकेत मिलता है कि प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने से पहले ही कुछ कारोबारियों पर इसका असर दिखाई देने लगा है। यदि यह चलन बढ़ता है, तो छोटे व्यापारियों के बीच डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है।

0.40 प्रतिशत MDR से कैसे घटेगा दुकानदारों का मुनाफा?
बिजनेस टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, अध्ययन के सह-लेखक आनंद सुधाकरण ने बताया कि पहली नजर में 0.40 प्रतिशत MDR बहुत छोटा शुल्क दिखाई देता है, लेकिन छोटे कारोबारियों के सीमित मुनाफे पर इसका असर काफी बड़ा हो सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई दुकानदार अपने सप्लायर से 20,000 रुपये का सामान खरीदता है, तो उसे 80 रुपये अतिरिक्त MDR देना पड़ सकता है। वहीं, उसकी रोजाना शुद्ध कमाई 1,000 रुपये है, तो यह अतिरिक्त खर्च उसके दैनिक मुनाफे का लगभग 8 प्रतिशत होगा। इस तरह छोटी दिखने वाली फीस भी कारोबारियों की कमाई को प्रभावित कर सकती है।
B2B लेनदेन की अनदेखी से बढ़ सकती हैं खुदरा कीमतें
आनंद सुधाकरण के मुताबिक, फिलहाल MDR पर चर्चा मुख्य रूप से ग्राहक और दुकानदार के बीच होने वाले C2B लेनदेन तक सीमित है। जबकि थोक विक्रेताओं और छोटे कारोबारियों के बीच होने वाले बिजनेस-टू-बिजनेस (B2B) भुगतान पर भी ध्यान देना जरूरी है। नियमों के अनुसार MDR का खर्च व्यवसायों को उठाना है, ग्राहकों को नहीं। लेकिन छोटे दुकानदारों पर लागत बढ़ने से वे इसकी भरपाई के लिए सामान की कीमतें बढ़ा सकते हैं या ग्राहकों से नकद भुगतान मांग सकते हैं।

UPI डेटा से मिलने वाले फायदे भी समझना जरूरी
ISB के सेंटर फॉर एनालिटिकल फाइनेंस के कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर प्रसन्न तांतरी ने कहा कि MDR के पक्ष और विपक्ष में दिए जा रहे तर्कों का व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए। उनके अनुसार, केवल भुगतान प्रणाली की लागत देखना पर्याप्त नहीं है। UPI से मिलने वाले डेटा के जरिए फिनटेक कंपनियां छोटे कारोबारियों के कैश फ्लो का आकलन कर उन्हें आसानी से कर्ज उपलब्ध कराने में मदद करती हैं। इसलिए डिजिटल भुगतान से मिलने वाले आर्थिक और सार्वजनिक लाभों को भी नीति निर्धारण में शामिल किया जाना चाहिए।
टियर-1, टियर-2 और टियर-3 शहरों में जागरूकता का अंतर
अध्ययन में डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता और MDR के प्रति जागरूकता में भी बड़ा अंतर सामने आया है। टियर-1 शहरों में 82 प्रतिशत विक्रेता डिजिटल भुगतान स्वीकार करते हैं, जबकि टियर-2 में यह आंकड़ा 66 प्रतिशत और टियर-3 शहरों में 64 प्रतिशत है। वहीं MDR शुल्क की जानकारी टियर-1 के 66 प्रतिशत, टियर-2 के 55 प्रतिशत और टियर-3 के केवल 47 प्रतिशत विक्रेताओं को थी। अध्ययन के मुताबिक, MDR लागू करने से पहले छोटे कारोबारियों और उनकी थोक आपूर्ति व्यवस्था की वास्तविक परिस्थितियों को समझना जरूरी है।
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