Kali Chaudas 2026 : दीपावली से ठीक पहले मनाया जाने वाला काली चौदस का पर्व धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे छोटी दिवाली, नरक चतुर्दशी, रूप चौदस और भूत चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मां महाकाली, भगवान श्रीकृष्ण, हनुमान जी और यमराज की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन दीपदान और विधि-विधान से पूजा करने पर नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है तथा घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
काली चौदस 2026 की तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर 2026 को सुबह 10 बजकर 49 मिनट से शुरू हो रही है। इसका समापन 8 नवंबर 2026 को सुबह 11 बजकर 29 मिनट पर होगा। काली चौदस की विशेष रात्रि पूजा 7 नवंबर को की जाएगी।

इस वर्ष पूजा और स्नान का समय इस प्रकार है:

- काली चौदस: शनिवार, 7 नवंबर 2026
- चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 7 नवंबर, सुबह 10:49 बजे
- चतुर्दशी तिथि समाप्त: 8 नवंबर, सुबह 11:29 बजे
- काली पूजा का शुभ मुहूर्त: 7 नवंबर की रात 11:41 बजे से 8 नवंबर की रात 12:33 बजे तक
- अभ्यंग स्नान: रविवार, 8 नवंबर 2026
मां महाकाली की आराधना से दूर होती है नकारात्मकता
काली चौदस पर मां महाकाली की पूजा का विशेष महत्व है। गुजरात और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में इस अवसर पर विशेष रात्रि पूजा आयोजित की जाती है। भक्त मां को लाल फूल, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करते हैं। इसके बाद आरती करके परिवार की सुख-शांति और सुरक्षा की कामना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां महाकाली की आराधना से भय, नकारात्मकता और बुरी शक्तियों से रक्षा होती है। मां काली को शक्ति और अधर्म का विनाश करने वाली देवी माना जाता है।

यमराज के नाम पर जलाया जाता है विशेष दीपक
नरक चतुर्दशी पर यमराज के निमित्त दीपदान करने की परंपरा है। इसे यम दीपदान कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार के सदस्यों को दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है।
कई स्थानों पर शाम के समय चार बातियों वाला दीपक जलाकर दक्षिण दिशा में रखा जाता है। इस दौरान यमराज से परिवार के अच्छे स्वास्थ्य, सुरक्षा और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।
भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का भी है विशेष महत्व
नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर के वध से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का अंत करके उसके कब्जे से हजारों बंदी कन्याओं को मुक्त कराया था।
इसी विजय की स्मृति में इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। भक्त उन्हें तुलसी दल, फूल, फल और मिठाई अर्पित करते हैं। मान्यता है कि उनकी आराधना से जीवन में सकारात्मकता आती है और व्यक्ति को बुराइयों के विरुद्ध खड़े होने की शक्ति मिलती है।
काली चौदस पर हनुमान जी की पूजा क्यों की जाती है?
इस दिन हनुमान जी की पूजा का भी विशेष विधान है। उन्हें संकटमोचन और भय दूर करने वाला देवता माना जाता है। भक्त हनुमान मंदिर जाकर दर्शन करते हैं और सिंदूर तथा चमेली का तेल अर्पित करते हैं।
कई लोग इस अवसर पर हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करते हैं। धार्मिक विश्वास है कि बजरंगबली की आराधना से जीवन के संकटों का सामना करने का साहस मिलता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
8 नवंबर को होगा अभ्यंग स्नान, जानें रूप चौदस की परंपरा
नरक चतुर्दशी के अवसर पर अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व है। इस वर्ष यह स्नान 8 नवंबर 2026 को किया जाएगा। इसे रूप चौदस का स्नान भी कहा जाता है। परंपरा के अनुसार, इस दिन सूर्योदय से पहले शरीर पर तिल का तेल लगाकर उबटन से स्नान किया जाता है।
मान्यता है कि इससे शरीर की शुद्धि होती है और आरोग्य तथा सुंदरता का आशीर्वाद मिलता है। कुछ क्षेत्रों में अपामार्ग यानी चिरचिटा के पौधे को सिर के ऊपर से घुमाने की परंपरा भी प्रचलित है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान श्रीकृष्ण और अपने इष्ट देव की पूजा की जाती है।
छोटी दिवाली पर घर में जलाए जाते हैं दीपक
काली चौदस की शाम घर के मुख्य द्वार, आंगन, बालकनी, पूजा स्थल और तुलसी के पास दीपक जलाए जाते हैं। घर की साफ-सफाई और सजावट भी की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपों की रोशनी अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
बंगाल में 14 दीपक जलाने की है अनोखी परंपरा
पश्चिम बंगाल में काली चौदस को भूत चतुर्दशी के नाम से मनाया जाता है। इस दिन 14 दीपक जलाने की परंपरा है, जिसे बंगाली भाषा में ‘चौद्दो प्रदीप’ कहा जाता है। इन दीपकों को घर के अलग-अलग हिस्सों में रखा जाता है।
इसके अलावा 14 प्रकार की हरी पत्तेदार सब्जियों से तैयार भोजन खाने की परंपरा भी है, जिसे ‘चौद्दो शाक’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन परंपराओं का संबंध पूर्वजों के स्मरण और नकारात्मक शक्तियों से परिवार की रक्षा से है।
काली चौदस की पूजा विधि: घर पर ऐसे करें मां महाकाली की आराधना
काली चौदस पर घर में भी मां महाकाली की पूजा श्रद्धापूर्वक की जा सकती है। इसके लिए सबसे पहले पूजा स्थल की सफाई करके मां की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें।
- मां महाकाली के सामने घी या तेल का दीपक जलाएं।
- लाल फूल, अक्षत, धूप और फल अर्पित करें।
- अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार मिठाई या सात्विक भोग लगाएं।
- मां महाकाली का ध्यान करके परिवार की सुरक्षा और सुख-शांति की प्रार्थना करें।
- अंत में मां की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
विशेष रात्रि पूजा और तांत्रिक अनुष्ठान योग्य गुरु या अनुभवी पुरोहित के मार्गदर्शन में ही करने चाहिए।
नरकासुर वध की पौराणिक कथा क्या है?
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर अत्यंत अत्याचारी हो गया था। उसने देवताओं को परेशान करने के साथ हजारों कन्याओं को बंदी बना लिया था। इतना ही नहीं, उसने देवमाता अदिति के कुंडल भी छीन लिए थे।
नरकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। इसके बाद श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ युद्ध के लिए पहुंचे। प्रचलित कथा के अनुसार, युद्ध के दौरान सत्यभामा ने भी शस्त्र उठाया और नरकासुर के अंत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नरकासुर के वध के बाद बंदी कन्याओं को मुक्त कराया गया और देवताओं की छीनी हुई वस्तुएं वापस दिलाई गईं। इस विजय को अधर्म और अत्याचार पर धर्म की जीत माना जाता है। मान्यता है कि नरकासुर के अंत की खुशी में लोगों ने दीपक जलाकर उत्सव मनाया था। इसी घटना की स्मृति में नरक चतुर्दशी पर दीपदान और पूजा की परंपरा आज भी निभाई जाती है।
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