Constitutional Protection: राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस अब और तेज़ हो गई है। केंद्र सरकार ने गुरुवार (28 अगस्त, 2025) को सर्वोच्च न्यायालय में स्पष्ट किया कि किसी भी राज्य सरकार को राष्ट्रपति या राज्यपाल के कार्यों के खिलाफ मुकदमा दायर करने का अधिकार नहीं है। इस दावे के साथ केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद 361 का हवाला दिया, जो राष्ट्रपति और राज्यपाल को अदालती कार्यवाही से विशेष संरक्षण प्रदान करता है।

क्या है मामला?
तमिलनाडु सरकार द्वारा राज्यपाल पर विधेयकों को लंबे समय तक रोके रखने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में मांग की गई थी कि राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर फैसला लेने के लिए एक समय सीमा तय की जाए, ताकि विधायी प्रक्रिया बाधित न हो। इस पर सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने 12 अप्रैल को फैसला सुनाया कि राष्ट्रपति या राज्यपाल किसी विधेयक को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकते और उन्हें निश्चित समय में निर्णय लेना ही होगा।लेकिन इस फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत 14 सवालों के साथ आपत्ति जताई और इसे पुनः विचार के लिए राष्ट्रपति संदर्भ पीठ के समक्ष भेजा गया।

केंद्र की दलील: संविधान में स्पष्ट है संरक्षण
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय बेंच के समक्ष केंद्र का पक्ष रखते हुए कहा:”राष्ट्रपति और राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत अदालती कार्यवाही से पूर्ण सुरक्षा प्राप्त है। किसी भी राज्य सरकार को यह अधिकार नहीं कि वे उनके कार्यों को चुनौती देने वाली याचिका दाखिल करें।”उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति का कार्यालय राजनीतिक रूप से स्वायत्त होता है और कोई भी असहमति राजनीतिक मंच पर सुलझाई जानी चाहिए, न कि न्यायपालिका के माध्यम से।
अनुच्छेद 361: क्या कहता है यह संवैधानिक प्रावधान?
संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि:राष्ट्रपति या राज्यपाल के कार्यों के लिए उन्हें अदालत में जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता।उनके कार्यकाल के दौरान उनके खिलाफ कोई फौजदारी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।अदालत उन्हें किसी कार्य के लिए आदेश नहीं दे सकती।
सुप्रीम कोर्ट का सवाल: क्या न्यायपालिका मौन रहे?
हालांकि, कोर्ट ने केंद्र के तर्कों पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर कोई राज्यपाल किसी विधेयक को लंबे समय तक दबा कर रखता है और सरकार की वैध कार्यवाही बाधित होती है, तो क्या न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती? इसपर केंद्र का जवाब था कि अगर ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो समाधान राजनीतिक प्रक्रिया के तहत ढूंढा जाना चाहिए, ना कि न्यायिक आदेशों से।
संवैधानिक टकराव या संतुलन की कोशिश?
यह मामला अब केवल विधायी प्रक्रियाओं की समयसीमा का नहीं, बल्कि संविधान के विभिन्न अंगों के दायरे और संतुलन का बन चुका है। एक ओर न्यायपालिका का दायित्व है कि वह संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे, तो दूसरी ओर कार्यपालिका और संवैधानिक पदों की गरिमा और स्वायत्तता बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की प्रेसिडेंशियल रेफरेंस बेंच के निर्णय से न केवल राज्य और केंद्र के संबंधों की दिशा तय होगी, बल्कि राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पदों की सीमाओं और जवाबदेही को लेकर भी स्पष्टता आएगी।
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