Imam Association Objection: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा बार-बार भारत को हिंदू राष्ट्र कहे जाने पर विवाद बढ़ता जा रहा है। अब इस पर ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन ने कड़ा विरोध जताया है। संस्था के अध्यक्ष मौलाना साजिद राशिदी ने शनिवार को बयान जारी करते हुए कहा कि भारत संविधान और कानून से चलेगा, न कि गीता या कुरान से। उन्होंने भागवत के बयान को भारतीय संविधान के खिलाफ बताया और इसे अन्य धर्मों का अपमान करार दिया।

भागवत का हिंदू राष्ट्र बयान
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले एक हफ्ते में तीन से ज्यादा बार भारत को हिंदू राष्ट्र कहा। उनके अनुसार, भारत का वास्तविक स्वरूप हिंदू धर्म से जुड़ा हुआ है और यही देश की संस्कृति का मूल है। उनका कहना है कि देश में हिंदू धर्म का प्रभाव है, और यह एक “हिंदू राष्ट्र” है। इस बयान ने राजनीतिक और धार्मिक जगत में हलचल मचाई है, और इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

इमाम एसोसिएशन का विरोध
मौलाना साजिद राशिदी ने भागवत के इस बयान का विरोध करते हुए कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है, और यह संविधान से चलेगा, न कि किसी धार्मिक ग्रंथ से। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “भारत का कानून संविधान के तहत चलता है, गीता या कुरान से नहीं।”
राशिदी ने आगे कहा कि बार-बार हिंदू राष्ट्र का जिक्र करना भारत के विविधतापूर्ण धार्मिक समाज के लिए गलत है। उनका मानना है कि इस तरह के बयान से अन्य धर्मों के अनुयायियों का अपमान होता है। उन्होंने विशेष रूप से मुसलमानों, बौद्धों और सिखों के पर्सनल लॉ की रक्षा करने का समर्थन किया और कहा कि ऐसे पर्सनल लॉ खत्म नहीं होने चाहिए।
धर्मनिरपेक्षता पर जोर
मौलाना राशिदी ने भारत की धर्मनिरपेक्षता की भी बात की, जो संविधान में निहित है। उन्होंने कहा कि भारत को सभी धर्मों के अनुयायियों का सम्मान करना चाहिए, और यह धर्मनिरपेक्ष देश होने के नाते सभी धर्मों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करना उसका कर्तव्य है। उनका यह भी कहना था कि धर्म का निजी मामला होना चाहिए, और किसी भी धर्म को राज्य के मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
प्रतिक्रिया और भविष्य की दिशा
भागवत के हिंदू राष्ट्र बयान को लेकर राजनीतिक दलों की भी मिश्रित प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। जहां एक ओर BJP ने इसे भारतीय संस्कृति का सम्मान बताया, वहीं दूसरी ओर विपक्ष ने इसे भारतीय संविधान और समाज की विविधता के खिलाफ बताया है।
इस बयान के बाद, राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्रों में गहरी बहस शुरू हो गई है। कई लोग इसे देश की धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मानते हैं, जबकि कुछ इसे भारत की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं।
मोहन भागवत का हिंदू राष्ट्र बयान भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक चर्चा में एक नई दिशा की ओर इशारा कर रहा है। जबकि कुछ इसे सांस्कृतिक पुनर्निर्माण के रूप में देख रहे हैं, वहीं कई इसे संविधान और धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मानते हैं। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन की प्रतिक्रिया इस बात को दर्शाती है कि भारत के विविध धर्मों के अनुयायी संविधान के तहत समान अधिकारों की रक्षा के पक्षधर हैं। आने वाले समय में इस मुद्दे पर और भी बहस होने की संभावना है।










