Raigarh roads: रायगढ़ नगर पालिका निगम द्वारा शहर की 27 सड़कों पर करोड़ों रुपये की लागत से निर्माण और मरम्मत का काम किया गया, लेकिन कुछ ही महीनों में सड़कें फिर से खराब हालत में पहुंच गई हैं। बोईरदादर रोड, शालिनी स्कूल मार्ग, ढीमरापुर रोड, जुटमिल रोड और टीवी टॉवर रोड जैसे प्रमुख मार्गों पर डामर की परतें उखड़ने लगी हैं, जिससे आम जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

करोड़ों की लागत पर बनी सड़कें बारिश से पहले ही खराब
छह महीने पहले इन सड़कों का जीर्णोद्धार किया गया था, लेकिन पहली ही बरसात में गड्ढे नजर आने लगे। कबीर चौक से कांशीराम चौक तक, विजयपुर चौक से इंदिरा विहार मार्ग, जेल कॉम्प्लेक्स से अंबेडकर चौक तक और मालधक्का से स्टेशन मार्ग तक सड़कें टूटी-फूटी हो गई हैं। कोष्टापारा से शहीद चौक मार्ग पर तो 20 फीट लंबा गड्ढा बन गया है, जिसे स्थानीय लोग मलबा डालकर भरने की कोशिश कर रहे हैं।

नागरिकों और विपक्ष का सवाल: गुणवत्ता कहां गई?
शहर के नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी सड़कें टिकाऊ क्यों नहीं बनीं। विपक्ष के नेता सलीम नियारिया ने सड़क निर्माण में भारी अनियमितताओं का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि जरूरी स्थानों पर डामर की सही परत नहीं डाली गई, जबकि कम जरूरी मार्गों पर पैसा बर्बाद किया गया। इसके अलावा उन्होंने वित्त मंत्री और स्थानीय प्रशासन की निगरानी पर भी सवाल उठाए हैं।
भ्रष्टाचार और लापरवाही के आरोप
स्थानीय जनता का आरोप है कि ठेकेदार और अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे, लेकिन मरम्मत का काम शुरू तक नहीं हुआ। कुछ स्थानों पर भ्रष्टाचार की आशंका भी जताई जा रही है, क्योंकि गुणवत्ता और निगरानी में चूक से करोड़ों रुपये की बरबादी हुई है। नागरिकों का कहना है कि यह मामला जल्द से जल्द सुलझाना जरूरी है, वरना शहर के नागरिकों को और अधिक परेशानी का सामना करना पड़ेगा।
क्या है समाधान?
विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क निर्माण के दौरान गुणवत्ता नियंत्रण बेहद जरूरी है। ठेकेदारों को कड़े नियमों के तहत कार्य करना चाहिए और स्थानीय प्रशासन को निगरानी बढ़ानी होगी। केवल निर्माण नहीं, बल्कि नियमित रख-रखाव पर भी ध्यान देना होगा ताकि सड़कें लंबे समय तक टिकाऊ बन सकें।
रायगढ़ की सड़कों की बदहाल स्थिति स्थानीय प्रशासन की अनदेखी और भ्रष्टाचार की कहानी बयां करती है। करोड़ों की लागत के बाद भी आम जनता को असुविधा झेलनी पड़ रही है। अब सवाल ये है कि क्या प्रशासन और ठेकेदार इस समस्या का समाधान निकाल पाएंगे, या जनता की आवाज दब जाएगी?










