Naxals Surrender: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के इतिहास में एक नया मोड़ आता दिख रहा है। दशकों से जंगलों में सशस्त्र संघर्ष कर रहे माओवादी अब बंदूक छोड़कर लोकतंत्र की राह अपनाने की बात कर रहे हैं। इसे भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी नक्सलियों के इस बदलाव का स्वागत किया है।

राजनीति में आने को तैयार माओवादी
हाल ही में माओवादी संगठन की ओर से एक पत्र जारी किया गया, जिसमें उन्होंने शांति वार्ता की इच्छा जताई और सक्रिय राजनीति में शामिल होने के संकेत दिए। लंबे समय तक हिंसा और उग्रवाद का रास्ता अपनाने वाले इन संगठनों का यह बदला हुआ रुख देश के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

CM साय का स्वागत, आत्मसमर्पण नीति का असर
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि, “छत्तीसगढ़ सरकार की ‘नवीन आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025’ और ‘नियद नेल्ला नार योजना’ ने नक्सलियों में लोकतंत्र के प्रति विश्वास जगाया है। इसी का परिणाम है कि वे अब हिंसा का मार्ग छोड़कर मुख्यधारा में लौटने लगे हैं।”
इस नीति के तहत नक्सलियों को आत्मसमर्पण कर सम्मानजनक जीवन की ओर लौटने का अवसर दिया जा रहा है, जिसमें पुनर्वास, शिक्षा, और रोजगार की व्यवस्था शामिल है।
गृह मंत्री अमित शाह ने भी किया समर्थन
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी माओवादियों के इस बदले रुख का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि एंटी-नक्सल ऑपरेशन का असर है कि आज नक्सली संगठन हथियार छोड़कर बातचीत की बात कर रहे हैं। यह माओवाद के अंत की शुरुआत है।
उप-मुख्यमंत्री ने जताई सतर्कता
हालांकि, छत्तीसगढ़ के उप-मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने इस पत्र को लेकर सावधानी बरतने की बात कही है। उन्होंने कहा कि माओवादियों की नीयत पर संदेह किया जा सकता है, इसलिए उनकी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखना जरूरी है।
2026 तक नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़ का लक्ष्य
सरकार ने मार्च 2026 तक राज्य को नक्सल मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया है। बीते कुछ महीनों में बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है या सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए हैं। इससे साफ है कि माओवादी संगठन अब कमजोर हो चुके हैं और अस्तित्व बचाने के लिए अब राजनीतिक विकल्प तलाश रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में माओवाद का यह बदलाव सिर्फ एक रणनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की जीत भी है। अगर यह रुख स्थायी साबित होता है, तो आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ न सिर्फ नक्सल मुक्त होगा, बल्कि शांति और विकास के नए युग में प्रवेश करेगा।
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