Congress Protest: प्रदेश की सड़कों की बदहाल स्थिति को लेकर छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में कांग्रेस ने एक अनोखा और प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया। रविवार को कांग्रेस कार्यकर्ता बारसूर मार्ग की जर्जर हालत के विरोध में सड़क के गड्ढों में जाल डालकर मछली पकड़ने का नाटक करते नजर आए। यह दृश्य राहगीरों के लिए आश्चर्यजनक था, लेकिन इसने स्थानीय प्रशासन और सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी को खुलकर सामने रख दिया।

सड़क या तालाब? कांग्रेस का कटाक्ष
दरअसल, बारसूर मार्ग पर बने बड़े-बड़े गड्ढों में हाल की बारिश के कारण पानी भर गया है। इन गड्ढों के चलते स्थानीय लोगों को आवागमन में भारी परेशानी हो रही है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इसी मुद्दे को लेकर सड़क पर उतरकर प्रदर्शन और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सड़क की यह हालत सरकार की घोर लापरवाही को दर्शाती है। विरोध प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने सड़क पर बने गड्ढों में मछली पकड़ने की नौटंकी कर यह दिखाने की कोशिश की कि सड़कों की हालत अब “तालाब” जैसी हो गई है।
‘ट्रिपल इंजन सरकार’ पर तीखा हमला
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे कांग्रेस नेता विमल सुराना ने कहा, “प्रदेश में ट्रिपल इंजन की सरकार चल रही है – केंद्र, राज्य और जिला प्रशासन – लेकिन काम कहीं नहीं हो रहा।” उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब जिला मुख्यालय के आसपास की सड़कें ही इतनी खराब हैं, तो दूरदराज के क्षेत्रों की स्थिति की कल्पना की जा सकती है।
उन्होंने आगे कहा, “सरकार को जनता की कोई परवाह नहीं है। ये सड़कें आम नागरिकों के लिए खतरा बन चुकी हैं, लेकिन संबंधित विभागों की आंखें बंद हैं। यह प्रदर्शन एक चेतावनी है कि अगर जल्दी सुधार नहीं हुआ, तो कांग्रेस सड़कों पर उतरकर और बड़े स्तर पर आंदोलन करेगी।”
जनता को हो रही है भारी दिक्कत
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि गड्ढों से भरी इन सड़कों पर बाइक या स्कूटर से चलना जान जोखिम में डालने जैसा है। कई बार हादसे भी हो चुके हैं, लेकिन न लोक निर्माण विभाग हरकत में आया, न ही जनप्रतिनिधियों ने संज्ञान लिया। व्यापारियों, स्कूली छात्रों और दिहाड़ी मजदूरों को रोजाना इस रास्ते से गुजरना पड़ता है, जिससे उनकी परेशानियां बढ़ती जा रही हैं।
दंतेवाड़ा में कांग्रेस का यह रचनात्मक विरोध प्रदर्शन सड़कों की बदहाली पर एक तीखा व्यंग्य है। यह न सिर्फ सरकार को चेतावनी है, बल्कि सिस्टम को आईना भी दिखाता है। ऐसे प्रतीकात्मक आंदोलनों के ज़रिए जनता की आवाज़ को मज़बूती मिलती है और प्रशासन पर दबाव बनता है कि वे ज़मीनी हालात को गंभीरता से लें।
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