Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। लंबे समय से महागठबंधन में शामिल होने की कवायद कर रही लोक जनशक्ति पार्टी (पशुपति पारस) ने अब अपना रास्ता बदल लिया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस की अगुवाई वाली पार्टी ने खुद को महागठबंधन से अलग करते हुए असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के साथ हाथ मिला लिया है। पार्टी ने ऐलान किया है कि वह AIMIM के साथ मिलकर ‘तीसरा मोर्चा’ बनाकर बिहार विधानसभा चुनाव लड़ेगी।

महागठबंधन की सीट बंटवारे से नाराज़गी
लोकसभा चुनाव में एनडीए से बाहर होने के बाद पशुपति पारस लगातार महागठबंधन के संपर्क में थे। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) महागठबंधन में सम्मानजनक सीटों की मांग कर रही थी, जिस पर आरजेडी नेतृत्व सहमत नहीं हो पाया। ख़बरों की मानें तो आरजेडी ने उन्हें बहुत कम सीटें या पार्टी का आरजेडी में विलय करने का प्रस्ताव दिया था, जिसे पशुपति पारस ने ठुकरा दिया।

बुधवार (15 अक्टूबर 2025) को आरएलजेपी के राष्ट्रीय महासचिव प्रमोद सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए आधिकारिक तौर पर इस फैसले की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी अब तीसरे मोर्चे के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी।
चिराग के बाद चाचा ने किया ‘खेल’
यह घटनाक्रम बिहार में एक नया राजनीतिक समीकरण तैयार कर रहा है। एक तरफ जहां एनडीए ने कई मिन्नतों के बाद चिराग पासवान को 29 सीटों पर सहमत कर पाया है, वहीं अब उनके चाचा पशुपति पारस ने महागठबंधन से अलग होकर बड़ा ‘खेल’ कर दिया है।
दलित-मुस्लिम समीकरण पर दांव
पशुपति पारस बिहार के एक प्रमुख दलित (पासवान) चेहरा हैं और उनकी पार्टी का अच्छा खासा वोट बैंक है। दूसरी ओर, AIMIM का सीमांचल क्षेत्र के मुस्लिम वोटों पर मजबूत प्रभाव रहा है। इन दोनों पार्टियों के एक साथ आने से एक नया दलित-मुस्लिम समीकरण बन सकता है, जो दोनों ही मुख्य गठबंधनों—एनडीए और महागठबंधन—के लिए बड़ी चुनौती पेश करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि पारस का यह कदम महागठबंधन के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि वह पासवान वोटों को अपने पाले में लाने की उम्मीद कर रहा था। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की राजनीति में नवगठित यह ‘तीसरा मोर्चा’ चुनावी गणित को कितना प्रभावित करता है और सत्ता की दौड़ में किस पार्टी का खेल बिगाड़ता है।
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