Mohan Bhagwat : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक Mohan Bhagwat ने कर्नाटक सरकार के मंत्री Priyank Kharge द्वारा लिखे गए खुले पत्र पर प्रतिक्रिया देने से साफ इनकार कर दिया है। यह पत्र RSS की कानूनी स्थिति, पंजीकरण और आर्थिक पारदर्शिता को लेकर लिखा गया था। भागवत ने इसे राजनीतिक एजेंडा और नौटंकी बताते हुए कहा कि संघ को ऐसे आरोपों और सवालों का सामना करने की आदत है।

त्रिशूर कार्यक्रम में बोले भागवत, ‘हमारे पास छिपाने को कुछ नहीं’
केरल के Thrissur में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने कहा कि वह खरगे के पत्र का कोई जवाब नहीं देंगे क्योंकि RSS किसी भी तरह की गुप्त गतिविधि नहीं करता। उन्होंने कहा कि संघ का काम पूरी तरह सार्वजनिक है और उसकी शाखाएं खुले मैदानों में लगती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संघ में आने वाले लोगों को संगठन के बारे में पूरी जानकारी दी जाती है।भागवत ने स्पष्ट किया कि RSS के कार्यकर्ता समाज के बीच रहते हैं और आम लोग उन्हें रोज़ देखते हैं। उन्होंने कहा कि संघ के कार्यक्रम सार्वजनिक होते हैं और इसमें किसी प्रकार की गोपनीयता नहीं रखी जाती। ऐसे में संघ पर पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाना केवल भ्रम फैलाने की कोशिश है।

‘हिंदू धर्म भी रजिस्टर्ड नहीं’, भागवत का बड़ा बयान
RSS के रजिस्ट्रेशन की मांग पर मोहन भागवत ने तर्क देते हुए कहा कि दुनिया में कई ऐसी व्यवस्थाएं और परंपराएं हैं जो पंजीकृत नहीं हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदू धर्म भी रजिस्टर्ड नहीं है। उनका कहना था कि पंजीकरण मुख्य रूप से उन संस्थाओं के लिए जरूरी होता है जो सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त करती हैं, जबकि RSS सरकार से कोई फंड नहीं लेता।भागवत ने कहा कि सरकार अच्छी तरह जानती है कि RSS का अस्तित्व है और वह समाज में सक्रिय है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार को संघ की गतिविधियों पर कभी संदेह होता, तो वह पहले ही उचित कार्रवाई करती। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ।
प्रतिबंधों का जिक्र कर संघ के इतिहास की याद दिलाई
मोहन भागवत ने RSS के इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि संगठन की स्थापना ब्रिटिश शासनकाल में हुई थी। उन्होंने कहा कि संघ पर दो बार प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन दोनों बार प्रतिबंध हटा लिया गया। एक बार न्यायिक प्रक्रिया के तहत और दूसरी बार सत्याग्रह के बाद।भागवत ने कहा कि अगर किसी संगठन पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो इसका अर्थ यह है कि सरकार उसके अस्तित्व और कार्यप्रणाली को स्वीकार करती है। उन्होंने कहा कि RSS का संविधान 1950 के दशक में ही सरकार को सौंप दिया गया था और तब से लेकर अब तक कभी अलग से पंजीकरण की जरूरत नहीं बताई गई।
प्रियंक खरगे ने सोशल मीडिया पर उठाए थे सवाल
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब प्रियंक खरगे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर RSS को एक खुला पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने संगठन की कानूनी स्थिति, फंडिंग स्रोत, आय-व्यय, संपत्ति और कर संबंधी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की थी।खरगे का कहना था कि जब देश में नागरिकों, कंपनियों, ट्रस्टों और गैर-सरकारी संगठनों को कानूनी रूप से पंजीकरण कराना और वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करनी होती है, तो RSS को इससे अलग क्यों रखा जाए। उनका तर्क था कि इतना बड़ा सामाजिक प्रभाव रखने वाला संगठन भी जवाबदेही के दायरे में आना चाहिए।
कर्नाटक में RSS की गतिविधियों का दिया हवाला
प्रियंक खरगे ने अपने पत्र में RSS की 2025-26 की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि केवल कर्नाटक में ही संघ की 4,127 दैनिक शाखाएं और 1,389 साप्ताहिक मिलन आयोजित होते हैं। इसके अलावा कई सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी चलाए जाते हैं।
बढ़ते विवाद के बीच राजनीतिक माहौल गर्म
RSS और कांग्रेस नेताओं के बीच यह विवाद अब राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। एक तरफ कांग्रेस संगठन की पारदर्शिता पर सवाल उठा रही है, वहीं RSS इसे राजनीतिक हमला करार दे रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में और बड़ा रूप ले सकता है।











