Mohan Bhagwat on Haldighati: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने उदयपुर में हल्दीघाटी युद्ध की 450वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भारत के इतिहास पर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत का इतिहास कभी भी गुलामी का इतिहास नहीं रहा, बल्कि यह उन आक्रांताओं के विरुद्ध निरंतर संघर्ष का प्रतीक है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता और संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया। भागवत ने महाराणा प्रताप के शौर्य को नमन करते हुए कहा कि हल्दीघाटी का युद्ध मात्र एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि यह विदेशी आधिपत्य के विरुद्ध भारतीय समाज के दीर्घकालीन प्रतिरोध का एक सशक्त उदाहरण था। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस युद्ध में महाराणा प्रताप की ही विजय हुई थी।

‘झूठे विमर्श’ से भारत के उत्थान को रोकने की साजिश
अपने संबोधन के दौरान आरएसएस प्रमुख ने गंभीर चिंता व्यक्त की कि देश और विदेश में कुछ शक्तियां सक्रिय हैं जो भारत के निरंतर उत्थान को बाधित करना चाहती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन शक्तियों के पास विशाल संसाधन, संगठनात्मक क्षमता और जनसंख्या का समर्थन है, जिसका उपयोग वे ‘झूठे विमर्श’ (False Narratives) गढ़कर और दुष्प्रचार फैलाकर लोगों को गुमराह करने के लिए कर रही हैं। भागवत ने देशवासियों को आगाह किया कि इन चुनौतियों के बावजूद भारत को अपने मूल मूल्यों और आदर्शों पर अडिग रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि समय की मांग है कि हम इन भ्रामक प्रचारों के जाल को समझें और राष्ट्रहित में एकजुट होकर कार्य करें।

महाराणा प्रताप का जीवन: धर्म, संस्कृति और स्वाभिमान का प्रतीक
मोहन भागवत ने मेवाड़ के महान शासक महाराणा प्रताप के जीवन को वर्तमान पीढ़ी के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बताया। उन्होंने रेखांकित किया कि महाराणा प्रताप ने कभी भी व्यक्तिगत लाभ या सत्ता के लालच में संघर्ष नहीं किया, बल्कि उनका पूरा जीवन धर्म, भारतीय संस्कृति और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए समर्पित था। भागवत के अनुसार, महाराणा प्रताप ने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। उनका संघर्ष पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक की तरह है, जो हमें सिखाता है कि कठिन समय में भी अपने संकल्प पर कैसे टिका रहा जा सकता है।
सांस्कृतिक विरासत ही भारत की वास्तविक शक्ति
आरएसएस प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की असली ताकत उसकी बढ़ती जनसंख्या या भौतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि उसकी हजारों वर्षों पुरानी अक्षुण्ण सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत में निहित है। उन्होंने कहा कि इतिहास के अनेक उतार-चढ़ाव और विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारत ने कभी भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को मिटने नहीं दिया। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे जाति, धर्म या संकीर्ण पहचानों के विभाजनों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बंधें। उन्होंने मेवाड़ की जनता का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार मेवाड़वासी संकट की घड़ी में महाराणा प्रताप के साथ चट्टान की तरह खड़े थे, उसी प्रकार आज भी पूरे देश को एकजुट होने की आवश्यकता है।
विश्व कल्याण के लिए भारत का सशक्त होना अनिवार्य
अपने संबोधन का समापन करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि भारत का उत्थान केवल भारत के हित में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए अपरिहार्य है। उन्होंने कहा कि एक सशक्त, समृद्ध और शांतिप्रिय भारत वैश्विक स्थिरता और मानव कल्याण के लिए एक अनिवार्य स्तंभ है। भागवत के अनुसार, जब भारत अपने गौरवशाली इतिहास और मूल्यों के साथ आगे बढ़ता है, तो वह न केवल अपनी रक्षा करता है, बल्कि पूरे विश्व को दिशा दिखाने का कार्य भी करता है। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे देश के उत्थान के इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपना पूर्ण योगदान दें।
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