NCERT-CBSE Vacancy 2026: देश की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और नई शैक्षणिक नीतियों को लागू करने में अहम भूमिका निभाने वाली संस्थाओं में कर्मचारियों की भारी कमी सामने आई है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी NCERT में स्वीकृत पदों के आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। वहीं, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE में भी करीब 44 प्रतिशत पद रिक्त हैं। इन आंकड़ों ने शिक्षा व्यवस्था की संस्थागत क्षमता और कामकाज को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

संसदीय समिति की रिपोर्ट में सामने आई तस्वीर
शिक्षा से जुड़े मामलों की संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में इन रिक्त पदों का उल्लेख किया गया है। देश में बच्चों को कम शुल्क में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वर्ष 2026-27 के बजट प्रावधानों पर समिति की सिफारिशें बुधवार को लोकसभा में रखी गईं। रिपोर्ट में शिक्षा से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं की स्थिति का आकलन करते हुए मानव संसाधन की कमी को दूर करने पर जोर दिया गया है।

NCERT में स्वीकृत पदों के मुकाबले आधे से भी कम कर्मचारी
रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर 2025 में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर NCERT में कुल 2,844 पद स्वीकृत थे। इनमें से सिर्फ 1,248 पदों पर अधिकारी और कर्मचारी कार्यरत थे। यानी संस्था में 1,596 पद खाली थे। यह कुल स्वीकृत पदों का 50 प्रतिशत से भी अधिक है। इतनी बड़ी संख्या में पद रिक्त रहने से संस्था के नियमित कामकाज और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट प्रभावित होने की आशंका है।
शिक्षा सुधार में NCERT की महत्वपूर्ण भूमिका
संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में NCERT की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है। समिति के अनुसार, देश में शिक्षा व्यवस्था में सुधार और शैक्षणिक प्रयोगों को बढ़ावा देने में संस्था की अहम भूमिका रही है। नई शिक्षा नीति यानी NEP 2020 तैयार करने में भी NCERT ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। ऐसे में संस्था में कर्मचारियों की कमी को दूर करना शिक्षा क्षेत्र के लिए जरूरी माना गया है।
CBSE में भी बड़ी संख्या में पद खाली
NCERT के अलावा CBSE में भी कर्मचारियों की कमी का मुद्दा सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार CBSE में कुल 2,117 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से 933 पद रिक्त हैं। इसका मतलब है कि बोर्ड के लगभग 44 प्रतिशत पदों पर नियुक्तियां नहीं हुई हैं। CBSE देश के लाखों विद्यार्थियों की स्कूली शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़ा प्रमुख संस्थान है, इसलिए यहां पर्याप्त कर्मचारियों की उपलब्धता महत्वपूर्ण मानी जाती है।

रिक्त पदों का असर कार्यक्षमता पर पड़ने की आशंका
संसदीय समिति ने संकेत दिया कि बड़ी संख्या में पद खाली होने का सीधा असर संबंधित संस्थाओं की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है। शिक्षा से जुड़ी नीतियों को लागू करने, पाठ्यक्रम तैयार करने, परीक्षाओं का संचालन करने और प्रशासनिक कामकाज को सुचारू रखने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन जरूरी है। ऐसे में NCERT और CBSE में रिक्त पदों को जल्द भरना शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
65 शिक्षा परिषदों के लिए एकीकृत नियामक की सिफारिश
संसदीय समिति ने देश में संचालित 65 शिक्षा परिषदों की निगरानी के लिए एक एकीकृत नियामक बनाने की सिफारिश भी की है। समिति का मानना है कि नई शिक्षा नीति के प्रावधानों के अनुरूप ऐसा नियामक बनाया जाना चाहिए, जो अलग-अलग शिक्षा परिषदों की कार्यप्रणाली पर नजर रख सके। इससे शिक्षा के मानकों में एकरूपता लाने और गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिल सकती है।
तीसरी भाषा की पढ़ाई को लेकर भी चिंता
रिपोर्ट में स्कूलों में विद्यार्थियों को तीसरी भाषा सिखाने की व्यवस्था को लेकर भी चिंता जताई गई है। नई शिक्षा नीति के तहत कक्षा छह के बाद विद्यार्थियों को तीसरी भाषा सीखने का प्रावधान किया गया है। हालांकि, समिति के मुताबिक कई जगहों पर विद्यार्थियों को इसके लिए पर्याप्त समय और जरूरी शैक्षणिक व्यवस्था उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
तीसरी भाषा के शिक्षकों की नियुक्ति पर जोर
संसदीय समिति ने सुझाव दिया है कि तीसरी भाषा की पढ़ाई को प्रभावी बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए। साथ ही विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को तीसरी भाषा के महत्व के बारे में जानकारी देना भी जरूरी है। समिति का मानना है कि केवल नीति में प्रावधान करने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि उसे जमीन पर लागू करने के लिए जरूरी संसाधन भी उपलब्ध कराने होंगे।
73 प्रतिशत विद्यार्थियों के पढ़ाई छोड़ने पर चिंता
रिपोर्ट में स्कूली शिक्षा के बाद विद्यार्थियों के पढ़ाई जारी रखने को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। समिति ने 73 प्रतिशत विद्यार्थियों के इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही शिक्षण संस्थान छोड़ने की प्रवृत्ति का उल्लेख किया है। इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों का बीच में शिक्षा छोड़ना देश की मानव संसाधन क्षमता और भविष्य की कार्यबल गुणवत्ता के लिए चुनौती बन सकता है।
ड्रॉपआउट के कारणों की पहचान जरूरी
समिति ने सुझाव दिया है कि विद्यार्थियों के बीच में पढ़ाई छोड़ने के वास्तविक कारणों का पता लगाया जाना चाहिए। आर्थिक स्थिति, स्कूलों की उपलब्धता, पारिवारिक परिस्थितियां, पढ़ाई का वातावरण या अन्य कारणों की पहचान कर उनके समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। रिपोर्ट में इस समस्या को दूर करने के लिए ठोस रणनीति बनाने पर जोर दिया गया है।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए मानव संसाधन अहम
NCERT और CBSE में बड़ी संख्या में पदों का खाली होना बताता है कि शिक्षा व्यवस्था में केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं है। उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए संस्थाओं को पर्याप्त अधिकारी-कर्मचारी, शिक्षक और प्रशासनिक संसाधन उपलब्ध कराना भी जरूरी है। संसदीय समिति की सिफारिशों में रिक्त पद भरने, शिक्षा परिषदों की निगरानी मजबूत करने, तीसरी भाषा की व्यवस्था बेहतर करने और ड्रॉपआउट कम करने जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया है। इन सुझावों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है तो देश की शिक्षा व्यवस्था में दीर्घकालिक सुधार की संभावना बढ़ सकती है।
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