Rakhigarhi DNA Study : राखीगढ़ी DNA जांच से खुलेगा हड़प्पा सभ्यता का राज, कौन थे सिंधु घाटी के लोग?

Rakhigarhi DNA Study : भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने हरियाणा के राखीगढ़ी से खुदाई में प्राप्त मानव कंकालों के अवशेषों को एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएनएसआई) को औपचारिक रूप से सौंप दिया है। एएनएसआई के निदेशक प्रोफेसर बी.वी. शर्मा ने बताया कि दोनों प्रमुख संस्थानों के बीच हाल ही में हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत यह प्रक्रिया पूरी की गई है। इस सहयोग का उद्देश्य सिंधु-सरस्वती सभ्यता के सबसे बड़े शहरी केंद्र राखीगढ़ी पर एक बहु-विषयक (मल्टी-डिसिप्लिनरी) शोध को नई दिशा देना है। यह कदम प्राचीन भारत के मानव इतिहास को आधुनिक वैज्ञानिक नजरिए से समझने की दिशा में एक बड़ी पहल है।

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आधुनिक तकनीकों से उजागर होंगे प्राचीन रहस्य

शोधकर्ताओं का मानना है कि ये अवशेष प्राचीन डीएनए विश्लेषण, स्थिर समस्थानिक अध्ययन (Stable Isotope Analysis), अस्थि-विज्ञान और पैलियो-पैथोलॉजी जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करते हैं। इन वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से हड़प्पा काल के लोगों की वंशावली, उनके प्रवासन के तरीके, खान-पान की आदतें, उस समय व्याप्त बीमारियां और जलवायु के प्रति उनके अनुकूलन की रणनीतियों को गहराई से समझा जा सकेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध न केवल मानव विकास के इतिहास को समझने में मदद करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि उस दौर में मानव और पर्यावरण के बीच कैसा संबंध था।

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राखीगढ़ी: सिंधु सभ्यता का विशालतम शहरी केंद्र

हरियाणा में स्थित राखीगढ़ी लगभग 550 हेक्टेयर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। इसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता का सबसे बड़ा ज्ञात स्थल माना जाता है। एएसआई की ग्रेटर नोएडा स्थित खुदाई शाखा-II द्वारा 2025-26 के फील्ड सीजन के दौरान टीला नंबर 7 पर की गई खुदाई में आठ महत्वपूर्ण कब्रें मिली थीं। इनमें से तीन पूर्ण कंकाल और अन्य अवशेषों को कोलकाता स्थित एएनएसआई की प्राचीन मानव कंकाल रिपॉजिटरी में विस्तृत वैज्ञानिक जांच के लिए भेजा गया है। यहां इन अवशेषों का संरक्षण और विश्लेषण किया जाएगा, ताकि भविष्य की पीढ़ियों के लिए इस जैविक विरासत को सुरक्षित रखा जा सके।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विशेषज्ञों की राय

आंध्र यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर विजय प्रकाश ने इस स्थानांतरण को पुरातत्व और मानवविज्ञान के मेल के रूप में एक मील का पत्थर बताया है। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह ने इसे भारत की पैलियो-एंथ्रोपोलॉजिकल शोध परंपरा को मजबूती देने वाला कदम करार दिया। वहीं, डेक्कन कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर सुभाष वालिम्बे के अनुसार, राखीगढ़ी जैसे शहरी केंद्रों का विकास इंसानों की जैविक और रोग-संबंधी प्रतिक्रियाओं को किस तरह प्रभावित करता है, यह समझने के लिए कंकालों की गहन मानववैज्ञानिक जांच अनिवार्य है।

भविष्य के लिए महत्वपूर्ण शोध की नींव

एएसआई और एएनएसआई के बीच हुआ यह सहयोग भारत के प्राचीन अतीत को समझने के लिए पुरातत्व, आनुवंशिकी और पर्यावरण विज्ञान को एक मंच पर ले आया है। राखीगढ़ी से मिले ये साक्ष्य दुनिया की सबसे शुरुआती शहरी सभ्यताओं में से एक की उत्पत्ति और उनके जीवन-शैली के कई अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठाने में सक्षम होंगे। यह शोध परियोजना न केवल भारतीय इतिहास को समझने के लिए, बल्कि वैश्विक स्तर पर प्राचीन शहरीकरण और मानव इतिहास के अध्ययन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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Chandan Das

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