Snana Purnima 2026: ओडिशा के पुरी स्थित विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में आज ‘स्नान पूर्णिमा’ का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी अनुष्ठान के साथ भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथ यात्रा की तैयारियों का विधिवत आरंभ हो जाता है। परंपरा के अनुसार, आज के दिन भगवान जगन्नाथ, उनके अग्रज भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा को मंदिर के ‘स्नान मंडप’ पर विराजमान किया गया। यहाँ 108 पवित्र कलशों के सुगंधित जल से उनका भव्य महाअभिषेक किया गया। इस महा स्नान के बाद ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं और वे एकांतवास में चले जाते हैं। इसी दौरान एक अत्यंत दुर्लभ और अद्भुत परंपरा ‘गज वेश’ का निर्वहन किया जाता है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुँचते हैं।

क्या है गज वेश की परंपरा और इसका महत्व?
स्नान पूर्णिमा के महाअभिषेक के पश्चात भगवान का अलौकिक श्रृंगार किया जाता है, जिसे ‘गज वेश’ या ‘हाथी वेश’ कहा जाता है। इस दिव्य श्रृंगार में भगवान जगन्नाथ और भगवान बलभद्र को हाथी के मुख जैसी आकर्षक और विशाल आकृतियों से सजाया जाता है। वहीं, देवी सुभद्रा को कमल के फूल के स्वरूप में सुसज्जित किया जाता है। भगवान का यह गज वेश भक्तों के लिए भक्ति और श्रद्धा का केंद्र होता है। इस श्रृंगार के पीछे की कथा जितनी रोचक है, उतनी ही प्रेरणादायक भी है। यह परंपरा न केवल प्रभु की अपने भक्तों के प्रति करुणा को दर्शाती है, बल्कि यह भी सिद्ध करती है कि भक्त की निस्वार्थ भावना भगवान को किसी भी रूप में प्रकट होने के लिए विवश कर सकती है।

गणपति भट्ट की भक्ति और भगवान का दिव्य दर्शन
गज वेश की इस परंपरा के पीछे 15वीं शताब्दी के महान विद्वान और भगवान गणेश के अनन्य भक्त, गणपति भट्ट की कथा जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गणपति भट्ट भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के लिए पुरी पहुँचे थे। स्नान यात्रा के दौरान जब उन्होंने भगवान के दर्शन किए, तो उन्हें प्रभु में अपने आराध्य गणेश जी का हाथी मुख स्वरूप नहीं दिखा, जिससे वे अत्यंत निराश हुए और पुरी छोड़कर जाने का निर्णय लिया। भगवान जगन्नाथ, जो अपने भक्तों के हृदय की भावना को भली-भांति जानते हैं, ने अपने भक्त को दुखी नहीं देखा। उन्होंने अपनी दिव्य लीला रची और जब अगली बार गणपति भट्ट ने स्नान मंडप पर दृष्टि डाली, तो वे यह देखकर चकित रह गए कि भगवान जगन्नाथ स्वयं काले गजानन स्वरूप में उन्हें दर्शन दे रहे थे।
दिव्य स्वरूप का दर्शन पाकर भावविभोर हुए भक्त
भगवान का वह गजानन रूप अलौकिक तेज से युक्त था। भगवान जगन्नाथ का काला हाथी मुख स्वरूप और भगवान बलभद्र का श्वेत गजानन स्वरूप देखकर गणपति भट्ट की आँखों से आँसू छलक पड़े। देवी सुभद्रा भी कमल स्वरूप में अत्यंत मनोहर लग रही थीं। प्रभु के इस दिव्य दर्शन ने न केवल गणपति भट्ट की श्रद्धा को सम्मान दिया, बल्कि तब से यह ‘गज वेश’ परंपरा पुरी मंदिर की एक स्थायी और प्रमुख पहचान बन गई। आज भी जब श्रद्धालु भगवान के इस रूप को देखते हैं, तो वे स्वयं को धन्य मानते हैं। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि भक्ति में यदि निष्कपट प्रेम हो, तो ईश्वर अपने भक्त की इच्छा पूर्ण करने के लिए किसी भी रूप में स्वयं को ढाल लेते हैं।











