Monsoon Break : पूरे देश में मानसून ने अपनी दस्तक के साथ ही अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। मुंबई-ठाणे से लेकर पूर्वोत्तर भारत और उत्तर भारत तक, बादलों ने जमकर मेहरबानी दिखाई। दिल्ली-एनसीआर में भी कुछ दिनों तक मूसलाधार बारिश का दौर चला, जिसके कारण गुरुग्राम जैसे शहरों की सड़कें तालाब में तब्दील हो गईं और जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया।

पहाड़ी राज्यों में तो स्थिति और भी गंभीर थी, जहाँ भारी बारिश के साथ बादल फटने की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी थी। लेकिन, अचानक मानसूनी बादलों की यह सक्रियता थम गई और देश के एक बड़े हिस्से में बारिश का सिलसिला रुक गया। आमजन के मन में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ रहा है कि आखिर मानसून की यह रफ्तार अचानक क्यों कम हो गई? क्या यह कोई असामान्य घटना है या मानसून की एक स्वाभाविक प्रक्रिया?

‘मानसून ब्रेक’ क्या है और यह क्यों आता है?
मौसम विज्ञान की दृष्टि से, मानसून के दौरान बारिश का अचानक थम जाना कोई अनपेक्षित घटना नहीं है। इसे तकनीकी भाषा में ‘मानसून विच्छेद’ या ‘मानसून ब्रेक’ (Monsoon Break) कहा जाता है। यह मानसून के अंत का संकेत बिल्कुल नहीं है, बल्कि एक अस्थायी विराम है जो हर साल मानसूनी चक्र के दौरान देखा जाता है। यह विराम कुछ दिनों का हो सकता है और कभी-कभी हफ्तों तक भी खिंच सकता है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून के सक्रिय रहते हुए भी ऐसी स्थितियां पैदा होना पूरी तरह से स्वाभाविक है। हालाँकि, दो-चार दिन बारिश न होने को मानसून ब्रेक नहीं माना जाता।
मानसून ब्रेक की तकनीकी और वैज्ञानिक शर्तें
IMD के अनुसार, आधिकारिक तौर पर मानसून ब्रेक घोषित करने के लिए दो प्रमुख शर्तें पूरी होनी चाहिए। पहली है ‘मानसूनी ट्रफ’ का खिसकना। मानसून के दौरान मध्य भारत में एक कम दबाव का क्षेत्र बनता है, जिसे ‘ट्रफ लाइन’ कहते हैं, यही बारिश का मुख्य कारक होता है। जब यह लाइन अपने सामान्य स्थान से उत्तर की ओर खिसक कर हिमालय की तलहटी में चली जाती है, तो मध्य और उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्रों में बारिश रुक जाती है।
दूसरी शर्त ‘कोर मानसून जोन’ में बारिश की भारी कमी है। जब ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में लगातार दो या उससे अधिक दिनों तक बारिश नगण्य या सामान्य से बहुत कम होती है, तब इसे ‘ब्रेक मानसून’ की श्रेणी में रखा जाता है।
विरोधाभासी स्थिति: कहीं सूखा तो कहीं बाढ़
मानसून ब्रेक के दौरान एक अजीबोगरीब ‘स्पेशियल पैराडॉक्स’ देखने को मिलता है। जब देश का मैदानी इलाका भीषण गर्मी और उमस की चपेट में होता है, ठीक उसी समय उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में मूसलाधार बारिश और फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ जाता है। इसका कारण यह है कि मानसून की नमी युक्त हवाएं जब मैदानी इलाकों से हटकर हिमालय की पहाड़ियों से टकराती हैं, तो वहां अत्यधिक बारिश कर देती हैं।
मानसून ब्रेक के लिए जिम्मेदार चार प्रमुख कारक
मानसून ब्रेक कोई एक कारण से नहीं, बल्कि कई वायुमंडलीय कारकों के मेल से आता है। सबसे पहला कारण है बंगाल की खाड़ी में लो-प्रेशर सिस्टम का न बनना। भारतीय मानसून को जीवन देने वाले ‘साइक्लोनिक सर्कुलेशन’ जब बंगाल की खाड़ी में नहीं बनते, तो मानसून हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। दूसरा कारण ‘मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन’ (MJO) है।
यह हिंद महासागर के ऊपर हवाओं का एक वैश्विक चक्र है; जब इसका एक्टिव फेज प्रशांत महासागर की ओर बढ़ जाता है, तो भारत के ऊपर हवाओं का पैटर्न बदल जाता है और बारिश थम जाती है। तीसरा कारक अरब सागर की शाखा का कमजोर होना है, जिससे पश्चिमी तट पर बारिश रुक जाती है। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण कारक ‘अल नीनो’ (El Niño) है, जिसमें प्रशांत महासागर के तापमान में वृद्धि के कारण मानसून ब्रेक की अवधि सामान्य 3-5 दिनों से बढ़कर हफ्तों तक पहुंच सकती है।
ऐतिहासिक दृष्टि: सबसे खतरनाक और लंबे मानसून ब्रेक
मौसम विभाग के पुराने रिकॉर्ड्स पर नजर डालें तो देश ने ऐसे कई मानसून ब्रेक देखे हैं जिन्होंने अकाल और सूखे की आहट दी थी। वर्ष 1972 में देश ने अब तक का सबसे लंबा मानसून ब्रेक देखा था, जो 18 जुलाई से 3 अगस्त तक चला। 18 दिनों के इस अंतराल ने देश के बड़े हिस्से को सूखे की कगार पर धकेल दिया था।
इसी तरह 2002 में जुलाई के महीने में दो सप्ताह से अधिक समय तक बारिश न होने से खरीफ फसलों को भारी नुकसान हुआ था और कुल बारिश में 51 फीसदी की कमी दर्ज की गई थी। साल 2009 भी अपने लंबे मानसून ब्रेक और उसके कारण आए सूखे के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज है।
कृषि और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ की एक बड़ी आबादी मानसून पर निर्भर है। मानसून ब्रेक का सबसे सीधा प्रहार धान, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी खरीफ फसलों पर पड़ता है। यदि बुआई के शुरुआती दिनों में 10 से 15 दिनों तक बारिश न हो, तो पौधों का विकास रुक जाता है, जिससे किसानों को दोबारा बुआई करनी पड़ती है। इससे उनकी उत्पादन लागत बढ़ जाती है। साथ ही, तालाबों और जलाशयों में पानी का जलस्तर गिरने से भूजल स्तर प्रभावित होता है, जो भविष्य में जल संकट का कारण बनता है।
मानसून ब्रेक का निष्कर्ष और चुनौतियां
अंततः, मानसून ब्रेक एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन इसकी अनिश्चितता चिंताजनक है। ब्रेक के दौरान बढ़ते तापमान से उमस और गर्मी बढ़ जाती है, वहीं जब यह ब्रेक खत्म होता है, तो कई बार अचानक अत्यधिक बारिश होने से बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बन जाता है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है, जिसके कारण मानसून की गतिविधियां अधिक अनिश्चित होती जा रही हैं।
मौसम विभाग इसी कारण लगातार निगरानी रखता है ताकि किसानों और आम जनता को समय रहते सचेत किया जा सके। मानसून ब्रेक की यह घटना हमें जल संरक्षण और सिंचाई प्रणाली को मजबूत बनाने की भी सीख देती है ताकि आने वाले समय की चुनौतियों का सामना किया जा सके।
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