Kanker News : छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर में गोंडी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग को लेकर महत्वपूर्ण पहल की गई। गोंडवाना भवन में आयोजित 11वीं राष्ट्रीय गोंडी भाषा मानकीकरण कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से आए भाषा विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और समाज प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य गोंडी भाषा का मानकीकरण, उसके संरक्षण और संवैधानिक मान्यता की दिशा में ठोस रणनीति तैयार करना था। कार्यक्रम के दौरान भाषा के साथ-साथ आदिवासी संस्कृति, इतिहास, परंपराओं और सामाजिक विरासत को सुरक्षित रखने पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

छह राज्यों से पहुंचे भाषा विशेषज्ञ और समाज प्रतिनिधि
इस राष्ट्रीय कार्यशाला में छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड सहित छह राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। विभिन्न क्षेत्रों से आए विशेषज्ञों ने गोंडी भाषा के अलग-अलग स्वरूपों, बोलियों और उनके एकरूप मानकीकरण पर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में मंडला लोकसभा सांसद डॉ. फग्गन सिंह कुलस्ते, भानुप्रतापपुर विधायक सावित्री मंडावी, कांकेर विधायक आशाराम नेताम सहित कई जनप्रतिनिधि और समाज के वरिष्ठ लोग भी उपस्थित रहे। सभी ने भाषा संरक्षण के इस प्रयास को ऐतिहासिक और आवश्यक बताया।

गोंडी भाषा की समृद्ध विरासत पर जोर
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सांसद डॉ. फग्गन सिंह कुलस्ते ने कहा कि गोंडी भारत की प्राचीन और समृद्ध भाषाओं में से एक है। उन्होंने बताया कि अलग-अलग राज्यों में गोंडी भाषा के कई रूप और बोलियां प्रचलित हैं, जिसके कारण इसके मानकीकरण की प्रक्रिया में समय लग रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि सभी राज्यों के भाषा विशेषज्ञों और समाज के सहयोग से जल्द ही एक मानक स्वरूप तैयार किया जा सकेगा। उनके अनुसार, भाषा का संरक्षण केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का प्रयास भी है।
13 हजार शब्दों के मानकीकरण का रखा गया लक्ष्य
कार्यशाला में शामिल समाज प्रतिनिधि ललित नरेटी ने जानकारी दी कि अब तक गोंडी भाषा के 10 हजार से अधिक शब्दों का सफलतापूर्वक मानकीकरण किया जा चुका है। इस बार भानुप्रतापपुर में आयोजित कार्यशाला का लक्ष्य 13 हजार शब्दों के मानकीकरण तक पहुंचना है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे भाषा का मानक स्वरूप मजबूत होगा, वैसे-वैसे इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भी अधिक प्रभावशाली बनेगी। उनका मानना है कि यह कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए गोंडी भाषा को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
संस्कृति, इतिहास और परंपराओं पर भी हुई चर्चा
कार्यशाला केवल भाषा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें गोंड समाज की सांस्कृतिक विरासत पर भी गंभीर मंथन किया गया। प्रतिभागियों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों, धार्मिक आस्थाओं, लोक संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही आदिवासी समुदाय के अधिकारों, संवैधानिक प्रावधानों और उनके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर भी विचार-विमर्श किया गया। विशेषज्ञों का कहना था कि भाषा और संस्कृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं, इसलिए दोनों के संरक्षण के लिए समान रूप से प्रयास किए जाने चाहिए।
राष्ट्रपति और राज्यपाल के नाम सौंपा गया ज्ञापन
कार्यशाला के समापन अवसर पर प्रतिभागियों ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के नाम एक ज्ञापन तैयार किया। यह ज्ञापन एसडीएम के माध्यम से संबंधित अधिकारियों को सौंपा गया। ज्ञापन में गोंडी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग प्रमुख रूप से उठाई गई। समाज प्रतिनिधियों ने कहा कि यदि गोंडी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलती है तो इससे भाषा के संरक्षण, शिक्षा, शोध और सरकारी स्तर पर उसके उपयोग को नई दिशा मिलेगी।
संवैधानिक मान्यता की दिशा में अहम पहल
भानुप्रतापपुर में आयोजित यह राष्ट्रीय कार्यशाला गोंडी भाषा के संरक्षण और उसके मानकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भाषा के व्यवस्थित मानकीकरण के बाद केंद्र सरकार के सामने मजबूत आधार के साथ मांग रखी जा सकेगी। इससे न केवल गोंडी भाषा को नई पहचान मिलेगी, बल्कि देशभर में फैले गोंड समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को भी मजबूती मिलेगी।
केंद्र सरकार के फैसले पर टिकीं उम्मीदें
कार्यशाला के बाद अब समाज की नजर केंद्र सरकार के निर्णय पर है। गोंड समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि गोंडी भाषा करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलना चाहिए। उनका विश्वास है कि लगातार हो रहे मानकीकरण, शोध कार्य और सामाजिक प्रयासों के बल पर यह मांग भविष्य में सकारात्मक परिणाम तक पहुंचेगी। यदि ऐसा होता है तो यह गोंडी भाषा और आदिवासी समाज के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि साबित होगी।












