Jantar Mantar Protest : नीट पेपर लीक मामले को लेकर जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुए कुछ वीडियो ने युवाओं के व्यवहार, भाषा और सामाजिक मूल्यों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। वरिष्ठ लेखक एवं सामाजिक चिंतक संतोष दास सरल का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक विरोध में असहमति व्यक्त करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन यदि विरोध के दौरान अशोभनीय भाषा, अभद्र व्यवहार और मर्यादाओं का उल्लंघन दिखाई देता है तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बन जाता है। उनके अनुसार यह केवल किसी एक घटना का प्रश्न नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को मिलने वाले संस्कारों और सामाजिक दिशा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।

संस्कारों का अगली पीढ़ी तक पहुंचना समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी
संतोष दास सरल का कहना है कि किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, परंपराओं और नैतिक मूल्यों से होती है। यदि एक पीढ़ी अपने संस्कारों का सही तरीके से अगली पीढ़ी तक हस्तांतरण नहीं कर पाती, तो समाज के नैतिक ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उनका मानना है कि आधुनिकता और तकनीकी विकास का स्वागत होना चाहिए, लेकिन इसके साथ शालीनता, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है। केवल तकनीक से समाज मजबूत नहीं बनता, बल्कि उसके नागरिकों के व्यवहार और मूल्यों से उसकी वास्तविक पहचान तय होती है।

सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर जताई चिंता
लेख में यह भी कहा गया है कि इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म युवाओं के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में यदि इन माध्यमों पर अभद्र भाषा, आक्रामक व्यवहार या अनुचित सामग्री सामान्य रूप से स्वीकार की जाने लगे, तो इसका प्रभाव किशोरों और युवाओं की सोच पर पड़ सकता है। लेखक का मत है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन इसके साथ सामाजिक मर्यादा और जिम्मेदारी का पालन भी उतना ही जरूरी है।
विरोध प्रदर्शन और सामाजिक मर्यादा का संतुलन जरूरी
संतोष दास सरल ने अपने विचारों में कहा कि किसी भी सरकार, नीति या व्यवस्था का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जा सकता है, लेकिन विरोध का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जिससे समाज में सकारात्मक संदेश जाए। उनका कहना है कि यदि विरोध प्रदर्शन के दौरान शालीनता और अनुशासन की सीमाएं टूटती हैं, तो मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है और चर्चा केवल व्यवहार पर केंद्रित हो जाती है। इसलिए किसी भी आंदोलन की प्रभावशीलता उसके उद्देश्य के साथ-साथ उसके आचरण पर भी निर्भर करती है।
पुराने आंदोलनों का उदाहरण देकर रखा अपना पक्ष
लेखक ने वर्ष 2012 के निर्भया आंदोलन और भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन आंदोलनों में भी देशभर के युवाओं की बड़ी भागीदारी रही थी। उनके अनुसार उन आंदोलनों में व्यापक जनसमर्थन होने के बावजूद सार्वजनिक मंचों पर अनुशासन और संयम बनाए रखने का प्रयास दिखाई देता था। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि किसी भी जनआंदोलन की पहचान केवल उसके मुद्दे से नहीं, बल्कि उसमें शामिल लोगों के व्यवहार और सार्वजनिक आचरण से भी बनती है।

नई पीढ़ी की दिशा पर गंभीर मंथन की जरूरत
लेख के अंत में संतोष दास सरल ने समाज, परिवार और शिक्षण संस्थानों से नई पीढ़ी के नैतिक विकास पर गंभीरता से विचार करने की अपील की है। उनका कहना है कि आज का दौर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल तकनीक और तेज सूचना प्रवाह का है, लेकिन इसके साथ मानवीय संवेदनाएं, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। उनके अनुसार यदि समय रहते इस विषय पर गंभीर चिंतन नहीं किया गया, तो भविष्य में भारतीय समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान और नैतिक मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए अधिक प्रयास करने पड़ सकते हैं।
आलेख-
संतोष दास ‘सरल’
समसामयिक विश्लेषक
अंबिकापुर,9826165324











