FCRA Bill Row: भारत की संसद में पेश किए गए विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill 2026) को लेकर अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। वेस्ट वर्जीनिया से कांग्रेस सदस्य मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट साझा करते हुए आरोप लगाया कि प्रस्तावित विधेयक भारत में ईसाई समुदाय और धार्मिक संस्थाओं को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि विधेयक मौजूदा स्वरूप में आगे बढ़ता है, तो इसका असर भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है।

राइली मूर ने क्या कहा?
राइली मूर ने अपने बयान में भारत में ईसाई धर्म के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ दशकों बाद सेंट थॉमस द एपोस्टल भारत के मलाबार तट, वर्तमान केरल, पहुंचे थे और तभी से भारत में ईसाई धर्म की समृद्ध परंपरा रही है। मूर ने दावा किया कि इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बावजूद भारतीय संसद जिस संशोधन पर विचार कर रही है, उससे सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं की संपत्तियों पर नियंत्रण का अधिकार मिल सकता है। उन्होंने इसे ईसाई संगठनों के लिए चिंता का विषय बताया।

क्या है FCRA संशोधन विधेयक 2026?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 में संशोधन के लिए लाया गया यह विधेयक संसद के मानसून सत्र में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। इसका उद्देश्य गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), चैरिटेबल ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड के नियमन से जुड़े प्रावधानों में बदलाव करना है। विधेयक के तहत एक ‘नामित प्राधिकरण’ गठित करने का प्रस्ताव रखा गया है, जो कुछ विशेष परिस्थितियों में संबंधित संस्थाओं की विदेशी फंड से निर्मित संपत्तियों और धन के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल सकेगा।
किन परिस्थितियों में प्राधिकरण करेगा प्रबंधन
प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द हो जाता है, वह स्वयं लाइसेंस सरेंडर कर देती है या उसका नवीनीकरण नहीं हो पाता, तो नामित प्राधिकरण विदेशी अंशदान से निर्मित संपत्तियों और शेष फंड के प्रबंधन का कार्य संभाल सकता है। सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था फंड और संपत्तियों के पारदर्शी एवं जिम्मेदार उपयोग को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से प्रस्तावित की गई है।
पूजा स्थलों के लिए क्या है प्रावधान
विधेयक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति प्राधिकरण के प्रबंधन में आती है, तो उसके धार्मिक स्वरूप को बनाए रखना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, जिन संगठनों ने पिछले दो वर्षों में 10 लाख रुपये से कम का विदेशी योगदान प्राप्त या खर्च किया है, उनके FCRA लाइसेंस के नवीनीकरण से संबंधित नए प्रावधान भी प्रस्तावित किए गए हैं। साथ ही कानून के उल्लंघन पर अधिकतम सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का भी प्रावधान शामिल है।

भारत में विधेयक को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं
प्रस्तावित संशोधन को लेकर देश के भीतर विभिन्न पक्षों की अलग-अलग राय सामने आई है। विपक्षी दलों, कुछ गैर-सरकारी संगठनों और विशेष रूप से केरल के कुछ चर्च संगठनों ने आशंका जताई है कि नए प्रावधानों से सरकार को विदेशी सहायता प्राप्त संस्थाओं की संपत्तियों पर अधिक नियंत्रण मिल सकता है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य विदेशी चंदे के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ाना, जवाबदेही तय करना और मनी लॉन्ड्रिंग जैसी अनियमित गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाना है।
सोशल मीडिया पर भी तेज हुई बहस
राइली मूर के बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई। कई भारतीय उपयोगकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि विदेशी फंडिंग से जुड़े कानून बनाना और उनमें संशोधन करना भारत का संप्रभु अधिकार है। वहीं, कुछ लोगों ने अमेरिकी सांसद की टिप्पणी को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देखा। दूसरी ओर, कुछ उपयोगकर्ताओं ने धार्मिक संस्थाओं से जुड़े प्रावधानों पर अपनी चिंता भी व्यक्त की। फिलहाल यह विधेयक संसद में विचाराधीन है और इस पर राजनीतिक तथा सार्वजनिक बहस जारी है।
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