Direct Action Day 1946 : जुलाई 1946 में मोहम्मद अली जिन्ना ने बॉम्बे में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कांग्रेस को कड़े शब्दों में चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि मुस्लिमों को अलग देश नहीं मिला तो देश गृहयुद्ध की स्थिति में पहुंच सकता है। जिन्ना मुस्लिम लीग की ओर से पाकिस्तान की मांग पर अड़े हुए थे और इसी राजनीतिक संघर्ष के बीच उन्होंने 16 अगस्त को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ मनाने का ऐलान किया।

मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त को चुना था डायरेक्ट एक्शन डे
मुस्लिम लीग का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस को यह दिखाना था कि पाकिस्तान की मांग को लेकर उसके समर्थक पीछे हटने वाले नहीं हैं। डोमिनिक लैपियरे और लैरी कॉलिंस की पुस्तक ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में इस दौर का विस्तृत वर्णन मिलता है। पुस्तक के अनुसार, जिन्ना ने अपने समर्थकों के सामने ‘डायरेक्ट एक्शन’ को राजनीतिक दबाव बनाने के तरीके के रूप में प्रस्तुत किया था।

कलकत्ता में शुरू हुई हिंसा ने लिया भयावह रूप
16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान कलकत्ता में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। शहर में मुस्लिम लीग समर्थकों की रैलियां और प्रदर्शन हुए, जिसके बाद कई इलाकों में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच हिंसक टकराव शुरू हो गया। हालात तेजी से बिगड़ते गए और पुलिस तथा प्रशासन के लिए स्थिति को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया।
आगजनी और हत्याओं से दहल उठा पूरा शहर
‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में उस समय की भयावह परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है। हिंसा के दौरान दोनों समुदायों के लोगों पर हमले हुए, आगजनी हुई और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। बाजारों तथा रिहायशी इलाकों में आग लगाई गई और शहर के कई हिस्से हिंसा की चपेट में आ गए। इस घटना को इतिहास में ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग’ के नाम से भी जाना जाता है।
सुहरावर्दी की भूमिका को लेकर भी उठे सवाल
इस घटनाक्रम में मुस्लिम लीग के नेता हुसैन शहीद सुहरावर्दी की भूमिका भी चर्चा में रही। वह उस समय बंगाल के मुख्यमंत्री थे और बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। 16 अगस्त की तारीख के चयन तथा उस दिन प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर उनकी भूमिका पर इतिहासकारों के बीच लंबे समय से बहस होती रही है। हालांकि, हिंसा की जिम्मेदारी को केवल एक व्यक्ति या समुदाय तक सीमित करके देखना ऐतिहासिक रूप से जटिल विषय है।

हिंसा का जवाब हिंसा से दिया गया
कलकत्ता में भड़की सांप्रदायिक हिंसा जल्द ही दोनों समुदायों के बीच प्रतिशोध में बदल गई। हिंदू समूहों ने भी जवाबी हमले किए और बड़ी संख्या में लोग मारे गए। शहर की स्थिति इतनी भयावह हो गई कि सामान्य जनजीवन पूरी तरह प्रभावित हो गया। कई दिनों तक हिंसा, डर और अविश्वास का माहौल बना रहा।
नोआखाली और बिहार तक पहुंची सांप्रदायिक हिंसा
कलकत्ता की हिंसा का असर दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई दिया। नोआखाली और बिहार में सांप्रदायिक तनाव तथा हिंसा की घटनाएं सामने आईं। बाद में बंबई सहित कई अन्य इलाकों में भी तनाव बढ़ा। लगातार हो रही हिंसा ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों को बेहद कमजोर कर दिया और देश के राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंता बढ़ने लगी।
डायरेक्ट एक्शन डे बना विभाजन की दिशा में निर्णायक मोड़
16 अगस्त 1946 की घटनाओं ने भारत की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला। सांप्रदायिक हिंसा लगातार बढ़ने के कारण कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार के सामने सत्ता हस्तांतरण तथा भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था को लेकर चुनौती और गंभीर हो गई। देश के कई हिस्सों में फैली हिंसा ने साझा भारत के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए।
अखंड भारत की संभावना पर पड़ा गहरा असर
डायरेक्ट एक्शन डे के बाद राजनीतिक परिस्थितियां इतनी बदल गईं कि भारत के विभाजन की संभावना मजबूत होती चली गई। लगातार सांप्रदायिक संघर्ष ने यह धारणा मजबूत की कि दोनों प्रमुख राजनीतिक समुदायों के बीच समझौता करना बेहद कठिन हो चुका है। हालांकि विभाजन के पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और औपनिवेशिक कारण थे, लेकिन 16 अगस्त 1946 की हिंसा को इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण मोड़ों में गिना जाता है।
विभाजन की त्रासदी की ओर बढ़ता देश
डायरेक्ट एक्शन डे ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के अंतिम चरण को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद सांप्रदायिक हिंसा का सिलसिला थमने के बजाय कई क्षेत्रों में फैलता गया। अंततः 1947 में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया। विभाजन के साथ हुई व्यापक हिंसा और विस्थापन ने इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक को जन्म दिया।
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