CJI Surya Kant : भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने नालसर लॉ यूनिवर्सिटी के आगामी दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनने का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया है। छात्रों के विरोध के बाद यह मामला विवादों में आ गया था। इसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया के हस्तक्षेप ने भी विवाद को और बढ़ा दिया। जोधपुर में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को संबोधित करने के कुछ घंटे बाद CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि उन्होंने नालसर का निमंत्रण कभी स्वीकार ही नहीं किया था।
CJI ने साफ किया अपना रुख
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा कि उनके दीक्षांत समारोह में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता। इससे पहले नालसर की ओर से चार दिन पहले पुष्टि की गई थी कि विश्वविद्यालय ने परंपरा के अनुसार अगस्त के अंत या सितंबर में प्रस्तावित दीक्षांत समारोह के लिए CJI को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। अब मुख्य न्यायाधीश के बयान के बाद इस पूरे घटनाक्रम की स्थिति स्पष्ट हो गई है।
400 से ज्यादा छात्रों ने किया था विरोध
नालसर लॉ यूनिवर्सिटी में करीब 1,400 छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें से 400 से अधिक छात्रों ने मुख्य अतिथि के रूप में CJI सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने का विरोध किया था। छात्रों ने 20 जुलाई को संसद तक निकाले गए छात्र मार्च और उस दौरान कथित पुलिस कार्रवाई से संबंधित मामलों में CJI की अध्यक्षता वाली पीठ की टिप्पणियों को अपनी नाराजगी का आधार बनाया था।
पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई
CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ छात्रों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े कई मामलों की सुनवाई कर रही है। याचिकाओं में प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती, पैलेट गन के इस्तेमाल और छात्रों की पहचान के लिए फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। अदालत के सामने छात्रों के अधिकारों और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े कई गंभीर सवाल भी रखे गए हैं।
घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों की याचिका
इस मामले में पीठ ने घायल पुलिसकर्मियों के रिश्तेदारों की एक याचिका पर भी विचार किया। इसमें उन कथित आपराधिक तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की गई, जिन पर छात्र आंदोलन में शामिल होकर हिंसा करने का आरोप लगाया गया था। याचिका में बड़े पैमाने पर हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और प्रधानमंत्री समेत संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ कथित आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल के आरोप भी लगाए गए।
स्वतः संज्ञान न लेने पर छात्रों की नाराजगी
छात्रों की मुख्य आपत्ति उस मामले को लेकर बताई गई, जिसमें पीठ ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस ज्यादती पर स्वतः संज्ञान लेने से इनकार किया था। 22 जुलाई को एक वकील ने उचित याचिका दाखिल किए बिना मामले में हस्तक्षेप की मांग की थी। वकील ने दावा किया था कि उनके पास घटना से संबंधित वीडियो मौजूद हैं। CJI ने आरोपों को स्पष्ट करते हुए उचित याचिका दाखिल करने को कहा था।
अदालत ने सुरक्षित रखने को कहा वीडियो
बाद में इसी मुद्दे से संबंधित कई अन्य याचिकाएं अदालत में दाखिल की गईं। CJI की अध्यक्षता वाली पीठ ने पुलिस को छात्रों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया। साथ ही घटना से जुड़े वीडियो और सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने को कहा गया। अदालत ने निष्पक्ष जांच के संभावित तरीकों पर सुझाव भी मांगे। इसके अलावा भविष्य में हिंसक प्रदर्शनों को नियंत्रित करते समय पुलिस की कार्रवाई के लिए देशव्यापी दिशा-निर्देश तैयार करने हेतु आयोग गठित करने का सुझाव दिया गया।
बार काउंसिल के हस्तक्षेप से बढ़ा विवाद
छात्रों के विरोध के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया भी इस विवाद में शामिल हो गई। बार काउंसिल के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने नालसर के कुलपति को पत्र भेजकर मामले की जांच करने और विरोध करने वाले छात्रों की पहचान करने को कहा था। पत्र में ऐसे छात्रों के वकील के रूप में पंजीकरण को लेकर भी चेतावनी दी गई थी। इस कदम की कानूनी और शैक्षणिक हलकों में आलोचना हुई।
बार काउंसिल ने वापस लिया अपना आदेश
विवाद बढ़ने के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपना परिपत्र वापस ले लिया और इस कदम पर खेद भी जताया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बार काउंसिल से जवाब मांगा। अदालत ने टिप्पणी की कि नियामक संस्था को मुख्य न्यायाधीश और नालसर के छात्रों से जुड़े इस तरह के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था। अब CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्होंने नालसर के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनने का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया था।
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