Accused Photos : सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की ओर से आरोपियों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर नोटिस जारी किया है। याचिका में इस तरह की सामग्री सार्वजनिक किए जाने से आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और गरिमा पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर चिंता जताई गई है। मामला हेमेंद्र पटेल बनाम भारत संघ से जुड़ा है। अदालत ने मामले में केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
सोशल मीडिया पर कंटेंट डालने को लेकर उठे सवाल
याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि पुलिस द्वारा किसी आरोपी की तस्वीर या वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने से मुकदमे की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। अदालत में यह मुद्दा भी उठाया गया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप साबित होने से पहले उसकी तस्वीर या वीडियो व्यापक रूप से प्रसारित होने पर उसकी सार्वजनिक छवि और व्यक्तिगत गरिमा को नुकसान पहुंच सकता है। याचिका में इस पूरे मामले के लिए स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था की जरूरत बताई गई है।
मेटा और एक्स की नीतियों पर भी सवाल
इस मामले में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा और एक्स को भी पक्षकार बनाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि दोनों प्लेटफॉर्म की मौजूदा नीतियों में पुलिस द्वारा आरोपियों से संबंधित तस्वीरों और वीडियो को अपलोड किए जाने जैसे कंटेंट से निपटने के लिए पर्याप्त और स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। इसलिए सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी और उनकी कंटेंट नीतियों को भी मामले में शामिल करना जरूरी बताया गया।
मार्च 2026 में वापस ली गई थी पुरानी याचिका
इसी मुद्दे पर पहले भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। हालांकि, मार्च 2026 में याचिकाकर्ता ने उस याचिका को वापस ले लिया था। उस समय अदालत ने याचिकाकर्ता को इस विषय को व्यापक दायरे के साथ दोबारा उठाने की स्वतंत्रता दी थी। इसके बाद नए सिरे से दायर याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी मामले में शामिल किया गया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट के सामने रखा पक्ष
मंगलवार को सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिका से जुड़े प्रमुख मुद्दे रखे। उन्होंने अदालत को पिछली कार्यवाही की याद दिलाते हुए कहा कि मार्च में भी इसी विषय को लेकर अदालत का रुख किया गया था। इस बार याचिका का दायरा बढ़ाया गया है और मेटा तथा एक्स को भी पक्षकार बनाया गया है। उन्होंने दोनों प्लेटफॉर्म की नीतियों में स्पष्ट व्यवस्था के अभाव का मुद्दा उठाया।
CJI सूर्यकांत ने नोटिस जारी करने को कहा
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की नीतियों को भी मामले में शामिल करना जरूरी है। वकील ने बताया कि अलग-अलग हाईकोर्ट इस विषय पर कुछ दिशानिर्देश जारी कर चुके हैं। हालांकि, याचिका में पूरे देश के लिए एक समान, व्यावहारिक और प्रभावी व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई गई है। इन दलीलों के बाद CJI सूर्यकांत ने मामले में नोटिस जारी करने का निर्देश दिया।
अलग-अलग हाईकोर्ट के दिशानिर्देशों का जिक्र
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि विभिन्न हाईकोर्ट पहले ही पुलिस और सोशल मीडिया से जुड़े कुछ मामलों में दिशानिर्देश जारी कर चुके हैं। हालांकि, अलग-अलग राज्यों और अदालतों में अलग-अलग व्यवस्थाएं होने के कारण पूरे देश के लिए एक समान नीति की आवश्यकता महसूस की जा रही है। याचिकाकर्ता का जोर ऐसी व्यवस्था पर है, जिससे आरोपी के अधिकारों की रक्षा के साथ पुलिस की कार्रवाई में भी स्पष्टता बनी रहे।
सोशल मीडिया कंटेंट रोकना आसान नहीं: CJI
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने मामले की व्यावहारिक चुनौती की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर किसी सामग्री के प्रसार को नियंत्रित करना आसान नहीं है। सोशल मीडिया कोई ऐसी सीमा नहीं है जिसे बंद करके सामग्री के प्रसार को पूरी तरह रोका जा सके। अदालत के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल भी है कि किसी आपत्तिजनक या अधिकारों को प्रभावित करने वाले कंटेंट के प्रसार को व्यावहारिक रूप से किस तरह नियंत्रित किया जाए।
केंद्र और संबंधित पक्षों से मांगा जाएगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब केंद्र सरकार और मामले से जुड़े अन्य पक्षों से जवाब मांगा जाएगा। आगे की सुनवाई में अदालत यह देख सकती है कि पुलिस द्वारा आरोपियों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने के लिए किस तरह की कानूनी और व्यावहारिक व्यवस्था बनाई जा सकती है। साथ ही मेटा और एक्स की नीतियों में संभावित बदलाव तथा आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई और गरिमा के अधिकारों की सुरक्षा का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहेगा।
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