Parents Property Rights : सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार, सुरक्षा और सम्मान को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि परिस्थितियां ऐसी हों कि माता-पिता की सुरक्षा, देखभाल और सम्मान के लिए जरूरी हो, तो वे अपने बच्चों को संपत्ति से बाहर कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि बढ़ती उम्र किसी बुजुर्ग के लिए असुरक्षा, उपेक्षा या अपमान का आधार नहीं बन सकती। सम्मानपूर्वक जीवन जीना हर व्यक्ति का अधिकार है।
बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने बेटे और बहू को मकान से हटाने के ट्रिब्यूनल के आदेश को निरस्त कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के हित में बने कानून की व्यापक भावना को ध्यान में रखते हुए कहा कि बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।
2007 के कानून का उद्देश्य क्या है?
अदालत ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कानून का मकसद बुजुर्गों को आर्थिक सहायता, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना है। कोर्ट के अनुसार किसी सभ्य समाज की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वहां वरिष्ठ नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। जरूरत पड़ने पर ट्रिब्यूनल बच्चों को संपत्ति से हटाने का आदेश भी दे सकता है।
लखनऊ के बुजुर्ग से जुड़ा था पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट के सामने आया यह मामला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता की अपील से संबंधित था। उन्होंने जून 2022 में अपने बेटे को अपनी संपत्ति से बेदखल करने के लिए जिला प्रशासन के समक्ष आवेदन दिया था। बताया गया कि संबंधित मकान उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति थी। मामले में उनकी 81 वर्षीय मां की स्थिति भी सामने आई, जिन्हें घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने की नौबत आई थी।
एसडीएम और जिलाधिकारी ने दिया था बेदखली का आदेश
मामले की सुनवाई के बाद एसडीएम ने नवंबर 2022 में बेटे को मकान से हटाने का आदेश जारी किया था। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने अगस्त 2023 में एसडीएम के आदेश को बरकरार रखा। साथ ही बेटे और बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया गया। इसके बाद दोनों ने प्रशासनिक कार्रवाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश को कर दिया था रद्द
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए प्रशासनिक आदेश को निरस्त कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि 2007 के कानून में वरिष्ठ नागरिकों को अपनी संपत्ति से बेटे या बहू को सीधे बेदखल करने का स्पष्ट अधिकार नहीं दिया गया है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल की कार्रवाई को रद्द कर दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल की शक्तियां समझाईं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2007 के कानून की धारा 7 के तहत गठित ट्रिब्यूनल और धारा 8 के तहत उसे दी गई शक्तियों का मूल उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा करना है। अदालत ने माना कि कानून की भावना को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए ट्रिब्यूनल आवश्यक आदेश पारित कर सकता है। यदि किसी बुजुर्ग के सम्मान और सुरक्षा के लिए संपत्ति से बच्चों को हटाना जरूरी हो, तो ऐसी कार्रवाई की जा सकती है।
पुराने फैसलों का भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया हवाला
पीठ ने अपने फैसले में पहले दिए गए न्यायिक निर्णयों का भी उल्लेख किया। अदालत ने एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर (2021) के फैसले का संदर्भ देते हुए वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों से जुड़ी कानूनी स्थिति को स्पष्ट किया। इसके अलावा समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) और कमल कांत मिश्रा बनाम अतिरिक्त कलेक्टर (2025) मामलों में भी इसी तरह के कानूनी सिद्धांतों का उल्लेख किया गया था।
बुजुर्गों के लिए फैसले का क्या है महत्व?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह संदेश स्पष्ट है कि संपत्ति विवादों में केवल मालिकाना हक ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा, देखभाल और गरिमा भी अहम है। यदि बच्चे माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करते हैं या उनके सम्मानजनक जीवन में बाधा बनते हैं, तो कानून के तहत उपलब्ध उपायों का इस्तेमाल किया जा सकता है। फैसला बुजुर्गों के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Read More : Maharashtra Auto Taxi Rule: मराठी नहीं सीखी तो ऑटो-टैक्सी लाइसेंस होगा रद्द, पहले मिलेगा नोटिस