Bastar Dussehra 2026 : छत्तीसगढ़ के बस्तर में विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा महापर्व की शुरुआत पारंपरिक पूजा-विधान और गहरी धार्मिक आस्था के साथ हो गई है। लगभग सात सौ साल पुरानी इस ऐतिहासिक परंपरा का शुभारंभ परंपरागत ‘काछन गादी’ अनुष्ठान से हुआ। इस दौरान श्रद्धालुओं में उत्साह और भक्ति का विशेष माहौल देखने को मिला। बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट आदिवासी संस्कृति, प्राचीन रीति-रिवाजों और अनूठे धार्मिक आयोजनों के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है।
पनका समाज की बालिका ने धारण किया मां काछनदेवी का स्वरूप
काछन गादी पूजा-विधान के दौरान पनका समाज की नाबालिग कुंवारी कन्या पीहू ने मां काछनदेवी का स्वरूप धारण किया। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अनुष्ठान के दौरान देवी का बालिका के शरीर में वास माना जाता है। परंपरा के अनुसार, देवी के स्वरूप में विराजित बालिका को बेल के नुकीले कांटों से तैयार किए गए झूले पर लिटाया गया। यह दृश्य वहां मौजूद श्रद्धालुओं के लिए आस्था और कौतूहल का केंद्र बना रहा।
कांटों के झूले पर विराजकर देवी ने दी महापर्व की अनुमति
काछन गादी अनुष्ठान बस्तर दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण पारंपरिक रस्मों में से एक है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक, कांटों के झूले पर विराजमान मां काछनदेवी ने बस्तर राजपरिवार, क्षेत्र की जनता और प्रशासन को आगामी कार्यक्रमों के आयोजन की अनुमति प्रदान की। इसके साथ ही लगभग 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा महापर्व के विभिन्न कार्यक्रमों को निर्बाध और सकुशल संपन्न कराने की मंगलकामना की गई। इस परंपरा के पूरा होने के साथ ही पर्व के अगले आयोजनों का मार्ग प्रशस्त हुआ।
बस्तर राजपरिवार ने मां काछनदेवी और मां रैला देवी से लिया आशीर्वाद
अनुष्ठान के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य और माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव ने मां काछनदेवी के समक्ष शीश झुकाकर आशीर्वाद लिया। इसके बाद वे गोलबाजार पहुंचे, जहां मिरगान समुदाय की इष्ट देवी मां रैला देवी की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। दोनों पारंपरिक धार्मिक रस्मों के दौरान काछन गुड़ी और गोलबाजार क्षेत्र में पारंपरिक वाद्ययंत्र मोहरी बाजा की गूंज सुनाई दी। इससे पूरे इलाके में उत्सव और धार्मिक उल्लास का माहौल बन गया।
जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और श्रद्धालुओं की रही मौजूदगी
इस ऐतिहासिक आयोजन में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों, बस्तर के पारंपरिक समुदायों और देश-विदेश से आए पर्यटकों ने भाग लिया। कार्यक्रम में सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, समिति के उपाध्यक्ष बलराम मांझी और महापौर संजय पाण्डे उपस्थित रहे। इसके अलावा बस्तर कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी बीएन मीणा, कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा सहित मांझी-चालकी, नाइक-पाइक, पुजारी, गायता और अन्य गणमान्य नागरिक भी शामिल हुए।
मां दंतेश्वरी को समर्पित है बस्तर की सांस्कृतिक पहचान
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि क्षेत्र की जीवंत आदिवासी संस्कृति, सामुदायिक एकता और अटूट आस्था का प्रतीक है। यह महापर्व बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को समर्पित है। इसमें विभिन्न समुदायों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिलती है। काछन गादी की रस्म के साथ पर्व की शुरुआत होने के बाद अब आगामी 75 दिनों तक अलग-अलग पारंपरिक अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे। बस्तर दशहरा की यह अनूठी परंपरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाती है।
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