रायपुर के 36 सिटी मॉल में 2013 में हुई महिला की मौत के मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी। सुसाइड नोट, हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट और मां की गवाही अहम रही। पांच साल की सजा बरकरार है। आरोपी को चार सप्ताह में आत्मसमर्पण करना होगा।
रायपुर के 36 सिटी मॉल में 2013 में हुई महिला की मौत के मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी। सुसाइड नोट, हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट और मां की गवाही अहम रही। पांच साल की सजा बरकरार है। आरोपी को चार सप्ताह में आत्मसमर्पण करना होगा।

Woman Suicide Case :छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायपुर में वर्ष 2013 में हुई महिला की आत्महत्या से जुड़े मामले में दोषी ठहराए गए बाबली सिंह उर्फ बबलू उर्फ बोध सिंह को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई पांच साल के सश्रम कारावास और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा बरकरार रखी। साथ ही आरोपी को चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

मामले की सुनवाई जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने की। हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और निचली अदालत के फैसले का मूल्यांकन करने के बाद दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया। आदेश के अनुसार, आरोपी को निर्धारित चार सप्ताह की अवधि में संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष सरेंडर करना होगा। ऐसा नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट उसे हिरासत में लेकर सजा का पालन करा सकती है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 24 मई 2013 को रायपुर के 36 सिटी मॉल स्थित सिनेमा हॉल में मंजू शर्मा ने जहरीला पदार्थ खा लिया था। उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें डॉ. भीमराव आंबेडकर मेमोरियल अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हृदय और श्वसन तंत्र के काम करना बंद करने को मृत्यु का कारण बताया गया। फॉरेंसिक जांच में विसरा के नमूने में एल्युमिनियम फॉस्फाइड की पुष्टि हुई थी।
जांच के दौरान पुलिस ने मृतका के पर्स से सुसाइड नोट, सल्फास की पुड़िया, फोटो और पहचान पत्र जब्त किए थे। मामले में राज्य फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट भी अदालत के सामने पेश की गई। रिपोर्ट के अनुसार, जांच किए गए दस्तावेजों की लिखावट और हस्ताक्षर एक ही व्यक्ति के होने की पुष्टि हुई थी। सुसाइड नोट में कथित प्रताड़ना और धमकियों का उल्लेख भी मामले के महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में सामने आया।
मृतका की मां ने अदालत में गवाही देते हुए बताया था कि घटना से दो-तीन महीने पहले उनकी बेटी ने आरोपी द्वारा परेशान किए जाने की बात कही थी। गवाही के मुताबिक, आरोपी ने उसके बेटे को अगवा करने की धमकी भी दी थी। मां ने एक अन्य घटना का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि आरोपी ने दुकान में महिला के साथ कुर्सी से मारपीट की थी। इन बयानों को अभियोजन पक्ष ने अपने मामले के समर्थन में प्रस्तुत किया।

बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि मृतका का वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण था और वह पहले भी आत्महत्या की कोशिश कर चुकी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने सुसाइड नोट, हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट और परिजनों की गवाही का संयुक्त मूल्यांकन किया। अदालत ने मामले को केवल सामान्य विवाद या एक बार हुई कहासुनी तक सीमित मानने से इनकार किया। उसके अनुसार, उपलब्ध साक्ष्यों में दर्ज कथित प्रताड़ना और गंभीर धमकियों को गवाहों के बयानों से समर्थन मिला।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक विवाद या प्रताड़ना अपने आप आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनती। ऐसे मामलों में आरोपी के आचरण, मंशा और आत्महत्या के बीच संबंध स्थापित होना आवश्यक है। इस मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषसिद्धि को सही माना। इसी के साथ पांच साल के सश्रम कारावास और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा कायम रही। आरोपी को चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा।

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