Abhishek Banerjee FIR: बार-बार FIR पर कलकत्ता हाई कोर्ट सख्त, बंगाल सरकार को कड़ी फटकार

अभिषेक बनर्जी के खिलाफ लगातार दर्ज हो रही FIR को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने तीन मामलों में 30 नवंबर तक उनके खिलाफ कोई coercive action नहीं लेने का निर्देश दिया। साथ ही नई FIR दर्ज करने पर रोक लगाने का संकेत भी दिया।

Abhishek Banerjee FIR : कलकत्ता हाई कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ लगातार दर्ज हो रही एफआईआर को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार पर नाराजगी जताई है। सोमवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इसी तरह उनके खिलाफ नए मामले दर्ज होते रहे, तो कोर्ट व्यापक आदेश जारी कर सकता है। इसके तहत राज्य सरकार को अदालत की अनुमति के बिना अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कोई नई एफआईआर दर्ज करने से रोका जा सकता है।

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तीन FIR रद्द करने की याचिकाओं पर हुई सुनवाई

जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की अदालत में अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इन मामलों में अदालत ने फिलहाल अभिषेक बनर्जी के खिलाफ किसी भी तरह की जबरन कार्रवाई से मिली सुरक्षा को जारी रखा है। कोर्ट ने कहा कि लगातार मुकदमे दर्ज होने की स्थिति में वह भविष्य में व्यापक संरक्षण देने वाले आदेश पर विचार कर सकता है।

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जुलाई में दर्ज हुई थीं तीनों एफआईआर

अभिषेक बनर्जी के खिलाफ जिन तीन एफआईआर को चुनौती दी गई है, वे 4 जुलाई, 11 जुलाई और 23 जुलाई को दर्ज की गई थीं। इन मामलों का संबंध मुख्य रूप से ‘सेबाश्रय’ नामक सामुदायिक स्वास्थ्य पहल से जुड़े आरोपों से है। यह पहल अभिषेक बनर्जी की ओर से पिछले साल शुरू की गई थी। शुरुआती दो शिकायतों में से एक अभिजीत दास उर्फ बॉबी ने दर्ज कराई थी, जबकि दूसरी शिकायत किसी अन्य व्यक्ति की ओर से की गई थी।

एक जैसे आरोपों पर कोर्ट ने उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने गौर किया कि 4 जुलाई और 11 जुलाई को दर्ज दोनों शिकायतों का विषय लगभग एक जैसा था। इसी आधार पर कोर्ट ने बार-बार शिकायत और एफआईआर दर्ज किए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया। जस्टिस भट्टाचार्य ने कहा कि वह मई 2026 से इन मामलों की सुनवाई कर रहे हैं और अब मामले में व्यापक रोक लगाने का आदेश देने पर विचार कर रहे हैं।

जज बोले- अब बहुत हो चुका

जस्टिस भट्टाचार्य ने सुनवाई के दौरान अपनी नाराजगी स्पष्ट करते हुए कहा कि अब बहुत हो चुका है। उन्होंने कहा कि वह समकक्ष पीठ द्वारा सुवेंदु अधिकारी से जुड़े मामले में दिए गए आदेश को आधार बनाकर व्यापक रोक लगाने का आदेश पारित कर सकते हैं। अदालत ने संकेत दिया कि लगातार एक ही व्यक्ति के खिलाफ मामले दर्ज होने की प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक जारी नहीं रहने दिया जा सकता।

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25 अगस्त के आदेश का भी हुआ जिक्र

अदालत ने यह भी बताया कि 25 अगस्त को अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दर्ज कुछ अन्य एफआईआर के संबंध में वह पहले ही आदेश जारी कर चुकी है। अब कोर्ट यह देख रहा है कि मौजूदा तीन मामलों में भी अलग-अलग आदेश देने की जरूरत है या किसी व्यापक आदेश के जरिए स्थिति स्पष्ट की जाए। अदालत ने कहा कि आरोपों की जांच कराने पर उसे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन हिरासत में लेकर पूछताछ की आवश्यकता पर सवाल जरूर है।

अभिजीत दास की शिकायतों पर भी उठे सवाल

सुनवाई में अभिजीत दास उर्फ बॉबी की भूमिका भी चर्चा में रही। कोर्ट के समक्ष यह बात रखी गई कि दास लोकसभा चुनाव में दो बार हार चुके हैं और इसके बाद लगातार शिकायतें दर्ज करा रहे हैं। जज ने सवाल किया कि क्या लगातार शिकायतों का कारण केवल चुनाव में हार है। हालांकि, पश्चिम बंगाल सरकार ने दास को व्हिसलब्लोअर बताते हुए उनकी शिकायतों को गंभीरता से लेने की बात कही।

चुनाव हारने से शिकायत का अधिकार नहीं खत्म होता

अभिजीत दास की ओर से पेश वकील जयंत नारायण चटर्जी ने कहा कि किसी व्यक्ति के चुनाव हारने से शिकायत दर्ज कराने का अधिकार समाप्त नहीं होता। उन्होंने अभिषेक बनर्जी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘सेबाश्रय’ में मेडिकल उपचार छात्रों के जरिए कराए जाने का दावा है। उन्होंने कोर्ट से जांच जारी रखने की मांग की और कहा कि किसी नागरिक को शिकायत दर्ज कराने से नहीं रोका जाना चाहिए।

‘सेबाश्रय’ को लेकर राज्य सरकार के गंभीर आरोप

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजदीप मजूमदार ने अदालत को बताया कि ‘सेबाश्रय’ केंद्र में कथित तौर पर एक्सपायर्ड दवाओं का इस्तेमाल किया गया। सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र का संचालन क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट के नियमों के अनुरूप नहीं हुआ। इसके अलावा लिंग निर्धारण से संबंधित जांच किए जाने का आरोप भी राज्य सरकार की ओर से लगाया गया।

कोर्ट ने कहा- आरोपों का अभिषेक से सीधा संबंध नहीं

अदालत ने राज्य सरकार के आरोपों को सामान्य प्रकृति का बताते हुए कहा कि उसे इन आरोपों और अभिषेक बनर्जी के बीच सीधा संबंध दिखाई नहीं देता। जस्टिस भट्टाचार्य ने कहा कि यदि मेडिकल लापरवाही का मामला है तो उसकी जांच होनी चाहिए और आवश्यक होने पर आरोपपत्र दाखिल किया जाना चाहिए। कोर्ट ने संकेत दिया कि जांच की अनुमति है, लेकिन बिना पर्याप्त आधार के अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कठोर कार्रवाई उचित नहीं होगी।

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Chandan Das

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