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Alexander Nevsky Church: पुतिन की यरूशलम में बड़ी चाल, एक चर्च के जरिए इजराइल को घेरने की तैयारी

Alexander Nevsky Church: रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा भीषण युद्ध अब केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसकी तपिश पवित्र शहर यरुशलम के ‘ओल्ड सिटी’ तक पहुँच गई है। यहाँ स्थित एक छोटा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण चर्च, ‘चर्च ऑफ सेंट अलेक्जेंडर नेवस्की’, अचानक वैश्विक भू-राजनीति का केंद्र बन गया है। यह चर्च उस पवित्र स्थान के अत्यंत समीप है, जहाँ ईसाई मान्यताओं के अनुसार ईसा मसीह को क्रूस पर चढ़ाया गया था। धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण इस स्थल पर कब्जे को लेकर अब रूस और यूक्रेन के बीच एक नया मोर्चा खुल गया है।

Alexander Nevsky Church: ईसाई आस्था का प्रतीक और प्राचीन अवशेषों की विरासत

सेंट अलेक्जेंडर नेवस्की चर्च की महत्ता इसके नीचे दबे इतिहास में छिपी है। चर्च के तलघर में एक प्राचीन पत्थर का द्वार है, जिसके बारे में यह माना जाता है कि ईसा मसीह अपनी अंतिम यात्रा के दौरान उसी रास्ते से गुजरे थे। इसी कारण दुनिया भर के ईसाइयों के लिए यह जगह अगाध श्रद्धा का केंद्र है। करीब 100 साल पहले एक स्वतंत्र धार्मिक संस्था द्वारा निर्मित यह चर्च हमेशा से सरकारी नियंत्रण से बाहर रहा है, लेकिन वर्तमान युद्ध की परिस्थितियों ने इसे राष्ट्रवाद और वर्चस्व की लड़ाई में तब्दील कर दिया है।

Alexander Nevsky Church : यूक्रेनी ननें और रूसी दावे के बीच फंसा अस्तित्व

‘टेलीग्राफ यूके’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्तमान में इस चर्च का प्रबंधन 12 यूक्रेनी ऑर्थोडॉक्स ननें संभाल रही हैं। वे न केवल यहाँ निवास करती हैं, बल्कि चर्च की देखरेख और दैनिक प्रार्थनाओं का संचालन भी करती हैं। दूसरी ओर, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस चर्च का मालिकाना हक किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहते हैं। रूस का तर्क है कि जिस संत अलेक्जेंडर नेवस्की के नाम पर यह चर्च है, वे रूसी इतिहास के महान योद्धा और धार्मिक नायक हैं। पुतिन अपनी राजनीति में रूसी ऑर्थोडॉक्स ईसाई परंपरा को प्रमुखता देते रहे हैं और इस चर्च पर नियंत्रण उनके लिए एक बड़ी प्रतीकात्मक और कूटनीतिक जीत होगी।

कैदी की रिहाई और ‘गुप्त समझौते’ का रहस्य

इस विवाद में एक बड़ा मोड़ साल 2020 में आया। उस समय रूस ने ड्रग्स के मामले में जेल में बंद एक इजराइली महिला को रिहा किया था। इस रिहाई के लिए तत्कालीन इजराइली प्रधानमंत्री ने रूस से सीधी वार्ता की थी। रहस्य तब गहराया जब इस घटना के तुरंत बाद इजराइल के लैंड रजिस्टर में इस चर्च के स्वामित्व को बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई। अंतरराष्ट्रीय जानकारों का मानना है कि इजराइली कैदी की आजादी के बदले पर्दे के पीछे रूस को चर्च सौंपने का गुप्त आश्वासन दिया गया था। इसी घटनाक्रम के बाद से मामला और अधिक पेचीदा हो गया है।

इजराइल के लिए बढ़ी कूटनीतिक चुनौती

चूँकि यह चर्च यरुशलम में स्थित है, इसलिए अंतिम फैसला इजराइल के हाथ में है। इजराइल इस समय ‘दो पाटों के बीच’ फँसा हुआ है। एक तरफ उसका सबसे बड़ा सहयोगी अमेरिका यूक्रेन का समर्थन कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह रूस के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को भी दांव पर नहीं लगाना चाहता। इजराइल में रूस और यूक्रेन, दोनों ही देशों के प्रवासियों की एक बड़ी आबादी रहती है। वर्तमान में यह मामला इजराइल सरकार की एक उच्च स्तरीय समिति के पास लंबित है, जो चर्च के कानूनी और राजनीतिक भविष्य का फैसला करेगी।

धर्म और सत्ता के संघर्ष का नया अध्याय

यरुशलम का यह चर्च अब केवल प्रार्थना का स्थान नहीं रहा, बल्कि यह रूस के ‘ईसाई विरासत के रक्षक’ बनने की महत्वाकांक्षा और यूक्रेन के अपने अस्तित्व को बचाने के संघर्ष का प्रतीक बन गया है। यदि यह रूस के नियंत्रण में जाता है, तो यूक्रेनी ननों को यहाँ से बेदखल होना पड़ेगा, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा मानवाधिकार और धार्मिक मुद्दा बन सकता है। यरुशलम की गलियों से शुरू हुआ यह विवाद कब और कैसे सुलझेगा, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं।

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