Animal Sixth Sense
Animal Sixth Sense: सृष्टि का यह शाश्वत नियम है कि जिस जीव ने इस धरती पर जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है। मृत्यु वह परम सत्य है जिसे न तो विज्ञान टाल सकता है और न ही कोई दिव्य शक्ति। मनुष्य अक्सर इस बात से अनजान रहता है कि उसका अंतिम क्षण कब आएगा, लेकिन हमारे प्राचीन ग्रंथों और लोक मान्यताओं में इसके संकेतों का जिक्र मिलता है। 18 महापुराणों में से एक, गरुड़ पुराण, जीवन के अंतिम पड़ाव और आत्मा की यात्रा का विस्तार से वर्णन करता है।
इस पुराण के अनुसार, मृत्यु से पहले मनुष्य के शरीर में कई बदलाव आते हैं, जैसे आंखों की रोशनी कम होना, अपनी ही परछाई का दिखाई न देना और बोलने या सुनने की शक्ति क्षीण हो जाना। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इंसानों के विपरीत, प्रकृति ने कुछ जानवरों को यह विशेष शक्ति दी है कि वे अपनी मौत की आहट को समय से पहले ही पहचान लेते हैं?
जंगल के सबसे विशालकाय और बुद्धिमान जीव, हाथी, अपनी संवेदनशीलता के लिए जाने जाते हैं। हाथियों के बारे में यह प्रचलित है कि उन्हें अपनी मृत्यु का पूर्वाभास कई दिन पहले ही हो जाता है। जब किसी हाथी को लगता है कि उसका अंत समय निकट है, तो वह सबसे पहले झुंड से अलग होकर एकांत स्थान की तलाश करता है। वह खाना-पीना पूरी तरह छोड़ देता है और अपना शेष समय शांति से व्यतीत करना पसंद करता है। हाथियों के इस व्यवहार को वन्यजीव विशेषज्ञ उनकी उच्च मानसिक क्षमता और आध्यात्मिक संवेदनशीलता से जोड़कर देखते हैं।
पालतू जानवरों में कुत्ते और बिल्लियां इंसानों के सबसे करीब होते हैं। धार्मिक मान्यताओं और पशु व्यवहार विज्ञान के अनुसार, कुत्तों में न केवल अपनी मृत्यु, बल्कि अपने मालिक या आसपास के किसी मनुष्य की मृत्यु को भी भांपने की अद्भुत शक्ति होती है। मौत करीब आने पर कुत्ते अक्सर रोने जैसी आवाजें निकालते हैं और भोजन त्याग देते हैं। इसी तरह, बिल्लियों को भी लगभग एक सप्ताह पहले ही अपनी मृत्यु का आभास हो जाता है। बिल्ली एक ऐसा जीव है जो अपने अंतिम क्षणों में किसी की नजरों के सामने रहना पसंद नहीं करती। वह किसी सुनसान कोने या छिपी हुई जगह पर जाकर बैठ जाती है और बिना कुछ खाए-पिए प्राण त्याग देती है।
सिर्फ बड़े जानवर ही नहीं, बल्कि बिच्छू जैसे छोटे जीवों में भी मृत्यु को लेकर एक विशेष प्रकार की चेतना देखी गई है। ग्रामीण क्षेत्रों और पुराने जानकारों का मानना है कि बिच्छू को अपनी मृत्यु का पता करीब सात दिन (एक सप्ताह) पहले ही चल जाता है। मौत का संकेत मिलते ही बिच्छू अपनी आक्रामकता छोड़ देता है और आहार लेना बंद कर देता है। वह किसी पत्थर या अंधेरे कोने में दुबक जाता है और अपने अंत का इंतजार करता है। यह प्राकृतिक घड़ी इन जीवों को अपने जीवन चक्र को पूर्ण करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है।
हालांकि विज्ञान इन बातों को पूरी तरह से स्वीकार नहीं करता, लेकिन पशु व्यवहार विशेषज्ञों का मानना है कि बीमार होने या शरीर के अंग शिथिल पड़ने पर जानवरों की जैविक क्रियाएं बदल जाती हैं। जब कोई जीव मृत्यु के करीब होता है, तो उसका शरीर ऊर्जा संरक्षण के लिए भूख और प्यास की इच्छा को समाप्त कर देता है। गरुड़ पुराण की शिक्षाएं और जानवरों का यह व्यवहार हमें याद दिलाता है कि मृत्यु भले ही डरावनी लगे, लेकिन यह प्रकृति का एक सहज और व्यवस्थित हिस्सा है। ये संकेत इस बात का प्रमाण हैं कि प्रकृति ने हर जीव को विदाई के लिए तैयार होने का एक अवसर जरूर दिया है।
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