Arab-Islamic Summit 2025 : दोहा में इस्लामी देशों की बैठक, “अरब नाटो” को लेकर बड़ा कदम

Arab-Islamic Summit 2025 : दोहा में आयोजित अरब-इस्लामी आपातकालीन शिखर सम्मेलन ने पश्चिम एशिया की भू-राजनीति को एक नई दिशा दे दी है। इजरायल द्वारा कतर में हमास नेताओं पर किए गए हवाई हमले के बाद बुलाई गई इस बैठक में, मुस्लिम दुनिया के प्रमुख नेताओं ने एकजुट होकर जवाबी रणनीति पर विचार किया। इस बैठक में भले ही इजरायल के खिलाफ तत्काल आक्रामक कदमों पर सहमति नहीं बन पाई, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव ने सबका ध्यान खींचा – “अरब नाटो” के गठन की ओर पहला कदम।

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क्या है “अरब नाटो” का विचार?

दोहा में हुई इस बैठक में एक संयुक्त अरब सैन्य गठबंधन के निर्माण का प्रस्ताव पेश किया गया। सूत्रों के मुताबिक, यह गठबंधन नाटो (NATO) की तर्ज पर काम करेगा और इसका उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा, खासकर इजरायल जैसे बाहरी खतरों के खिलाफ साझा रक्षा तंत्र तैयार करना होगा।

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इराकी प्रधानमंत्री मोहम्मद अल-सुदानी ने कहा, “किसी भी अरब या इस्लामी देश की सुरक्षा हमारी सामूहिक सुरक्षा का हिस्सा है।” यह बयान बताता है कि अब मुस्लिम देश व्यक्तिगत प्रतिक्रियाओं की बजाय एकजुट रणनीति की ओर बढ़ रहे हैं।

पाकिस्तान की भूमिका

पाकिस्तान, जो दुनिया का एकमात्र परमाणु-संपन्न मुस्लिम देश है, इस बैठक में न सिर्फ सक्रिय रहा, बल्कि उसने “इजरायली योजनाओं पर नजर रखने” के लिए एक संयुक्त टास्क फोर्स के गठन की मांग की। इससे संकेत मिलता है कि पाकिस्तान इस गठबंधन में न सिर्फ सैन्य भूमिका निभा सकता है, बल्कि इंटेलिजेंस और रणनीतिक संचालन में भी प्रमुख भूमिका में रह सकता है।

मिस्र करेगा नेतृत्व?

राजनयिक सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस संभावित अरब नाटो का नेतृत्व मिस्र के हाथों में सौंपा जा सकता है। इसकी कई वजहें हैं: मिस्र अरब दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। सीमा इजरायल के साथ साझा करता है, जिससे उसकी रणनीतिक स्थिति मजबूत है। अमेरिका से गहरे संबंध होने के कारण मिस्र वैश्विक स्तर पर भी असरदार भूमिका निभा सकता है।

2015 में सऊदी अरब की पहल पर 34 मुस्लिम देशों का आतंकवाद विरोधी सैन्य गठबंधन बना था। अब दोहा सम्मेलन के बाद इस गठबंधन को एकजुट सैन्य ढांचे में बदला जा सकता है, जो इजरायल के विरुद्ध कूटनीतिक दबाव के साथ-साथ सैन्य संतुलन भी बनाए।

कूटनीतिक संदेश

कतर के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल-थानी ने सम्मेलन के उद्घाटन में कहा, “यह सिर्फ एक हमला नहीं था, यह कूटनीति और मध्यस्थता की नींव पर हमला था।” उनके इस बयान ने साफ कर दिया कि मुस्लिम दुनिया अब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहती।

“अरब नाटो” का विचार मुस्लिम दुनिया को एक साझा सुरक्षा ढांचे में जोड़ने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम हो सकता है। अगर यह गठबंधन अस्तित्व में आता है, तो इससे न केवल इजरायल के खिलाफ एकजुट मोर्चा बनेगा, बल्कि क्षेत्र में संतुलन की नई धुरी भी स्थापित होगी। आने वाले हफ्तों में इस योजना की दिशा और देश कौन-कौन इसमें शामिल होते हैं, इस पर दुनिया की नजर टिकी रहेगी।

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