Asia Cup 2025 : एशिया कप 2025 में भारत-पाकिस्तान मुकाबले से पहले देशभर में उत्साह के साथ-साथ विरोध के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत-पाक मैच को लेकर बहस तेज है। कई वर्गों ने इस मुकाबले के ‘बायकॉट’ की मांग भी उठाई है। लेकिन क्या आप जानते हैं, आज से करीब चार दशक पहले, इसी भारत और पाकिस्तान ने मिलकर एशिया कप की नींव रखी थी? और इसके पीछे की कहानी सिर्फ क्रिकेट की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की भी है — शुरुआत हुई थी महज दो टिकटों की अनदेखी से।
बात 1983 की है। भारत ने इंग्लैंड में ऐतिहासिक विश्व कप जीतकर क्रिकेट इतिहास में नया अध्याय लिखा था। फाइनल मुकाबले के लिए भारत के तत्कालीन क्रिकेट बोर्ड अध्यक्ष एन.के.पी. साल्वे को पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के लिए दो टिकटों की दरकार थी। लेकिन लॉर्ड्स के आयोजकों ने यह कहते हुए टिकट देने से मना कर दिया कि साल्वे को पहले ही दो टिकट दिए जा चुके हैं।
हालांकि, फाइनल के दौरान स्टेडियम में कई सीटें खाली थीं, फिर भी बीसीसीआई को टिकट नहीं दिए गए। यह घटना भारतीय क्रिकेट प्रशासन के लिए एक बड़े अपमान की तरह थी। साल्वे ने इसे क्रिकेट की दुनिया में इंग्लैंड-ऑस्ट्रेलिया के प्रभुत्व के तौर पर देखा — और उसी क्षण उन्होंने निश्चय कर लिया कि एशियाई देशों को अपनी खुद की ताकत बनानी होगी।
1983 के कुछ ही महीनों बाद, लाहौर में भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका के प्रतिनिधियों की बैठक हुई। एनकेपी साल्वे की अगुवाई में एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) की स्थापना हुई। लेकिन टूर्नामेंट आयोजित करना आसान नहीं था — सबसे बड़ी चुनौती थी फंडिंग।
इस समस्या का समाधान मिला शारजाह में। क्रिकेट प्रेमी और व्यवसायी शेख बुखातिर ने न सिर्फ आर्थिक सहायता दी, बल्कि अपने स्टेडियम को भी उपलब्ध कराया। यह वही शारजाह था, जहां पहले केवल निजी टूर्नामेंट होते थे — अब उसे एशिया कप जैसे आधिकारिक टूर्नामेंट की मेज़बानी का मौका मिला।
आख़िरकार, 1984 में पहला एशिया कप आयोजित हुआ — भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका की भागीदारी के साथ। मैच 50 ओवर के फॉर्मेट में खेले गए, और भारत ने सुनील गावस्कर की कप्तानी में पहला खिताब जीता। पाकिस्तान फाइनल तक नहीं पहुंच सका, और श्रीलंका उपविजेता रहा।
एशिया कप की कहानी सिर्फ एक टूर्नामेंट की नहीं, बल्कि एशियाई क्रिकेट को वैश्विक ताकत बनाने की यात्रा है। वह यात्रा जो शुरू हुई थी दो टिकटों के अपमान से, और पहुंची एशियाई एकजुटता तक। आज जब भारत-पाकिस्तान एक बार फिर आमने-सामने हैं, यह इतिहास याद दिलाता है कि यह टूर्नामेंट केवल रन और विकेट का खेल नहीं, बल्कि गौरव और सम्मान की नींव पर खड़ा है।
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