Bengal Election 2026
Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले निर्वाचन आयोग की ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी के मजबूत वोट बैंक माने जाने वाले मतुआ समुदाय के बीच अपनी नागरिकता और मतदान के अधिकार को लेकर गहरा डर व्याप्त हो गया है। इस कवायद के कारण लगभग 40 से 50 विधानसभा सीटों पर समीकरण बदलने की आशंका जताई जा रही है।
निर्वाचन आयोग द्वारा जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के आंकड़ों ने सबको चौंका दिया है। पश्चिम बंगाल में कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर अब 7.08 करोड़ रह गई है। इसका सीधा अर्थ है कि राज्य भर में लगभग 58,20,898 नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। आयोग के अनुसार, करीब 1.36 करोड़ प्रविष्टियों में तकनीकी खामियां हैं और 30 लाख मतदाता ‘अनमैप्ड’ श्रेणी में हैं, जिन्हें अब अपनी पहचान साबित करनी होगी।
मतुआ समुदाय, जो मूल रूप से बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थी हैं, उत्तर 24 परगना, नदिया और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में बड़ी संख्या में बसते हैं। 2002 के बाद पहली बार हो रही इस सघन जांच (SIR) ने इन परिवारों की नींद उड़ा दी है। समुदाय के नेताओं का कहना है कि विस्थापन और प्रवास के कारण कई परिवारों के पास पुराने औपचारिक रिकॉर्ड या माता-पिता से संबंध जोड़ने वाले दस्तावेज नहीं हैं। ऐसे में वोटर लिस्ट से नाम कटने का डर उन्हें सता रहा है।
ऑल इंडिया मतुआ महासंघ के अनुसार, वोटर वेरिफिकेशन की प्रक्रिया में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत दिए गए आवेदनों या प्रमाणपत्रों को फिलहाल मान्यता नहीं मिल रही है। आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 60,000 से 70,000 लोगों ने CAA के लिए आवेदन किया था, लेकिन अब तक केवल 10,000 से 15,000 लोगों को ही प्रमाण पत्र मिल सके हैं। दस्तावेजों की इस कमी के कारण हजारों मतदाता अनिश्चितता के भंवर में फंस गए हैं।
2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने मतुआ बहुल इलाकों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को करारी शिकस्त दी थी। पार्टी की यह जीत मुख्य रूप से CAA के जरिए नागरिकता देने के वादे पर टिकी थी। अब यदि बड़ी संख्या में मतुआ मतदाता सूची से बाहर हो जाते हैं, तो बोंगांव और रानाघाट जैसी सीटों पर बीजेपी की पकड़ कमजोर हो सकती है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति बीजेपी को फायदे के बजाय भारी चुनावी नुकसान पहुंचा सकती है।
आंकड़े बताते हैं कि मतुआ बहुल इलाकों जैसे गाइघाटा, हाबरा और बागड़ा में ‘अनमैप्ड’ मतदाताओं का प्रतिशत 11 से 14 प्रतिशत तक है, जबकि अल्पसंख्यक बहुल जिलों जैसे मुर्शिदाबाद में यह आंकड़ा मात्र 3 प्रतिशत से कम है। टीएमसी सांसद ममता बाला ठाकुर का दावा है कि सुनवाई के लिए बुलाए जाने वाले 75 प्रतिशत लोग मतुआ हैं। दूसरी ओर, बीजेपी नेता सुब्रत ठाकुर ने इसे भ्रम करार देते हुए कहा है कि आधार के साथ एक सहायक दस्तावेज पर्याप्त होगा।
निर्वाचन आयोग की यह सुनवाई 15 जनवरी तक चलेगी और अंतिम मतदाता सूची 14 फरवरी को जारी की जाएगी। तब तक बंगाल की राजनीति में मतुआ वोट बैंक को लेकर अनिश्चितता और तनाव बने रहने की संभावना है।
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