कुण्डला वसुंधरा सिटी के 110 भवनों के ध्वस्तीकरण मामले में हाईकोर्ट ने शासन व नगर निगम के आदेश निरस्त किए। नौ साल बाद भवन स्वामियों को बड़ी राहत मिली।
कुण्डला वसुंधरा सिटी के 110 भवनों के ध्वस्तीकरण मामले में हाईकोर्ट ने शासन व नगर निगम के आदेश निरस्त किए। नौ साल बाद भवन स्वामियों को बड़ी राहत मिली।

Big Decision Of High Court : अंबिकापुर की कुण्डला वसुन्धरा सिटी में रहने वाले 110 परिवारों के लिए शुक्रवार का दिन बड़ी राहत लेकर आया। करीब नौ वर्षों से अपने आशियानों पर मंडरा रहे ध्वस्तीकरण के खतरे के बीच छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य शासन और नगर निगम के उन आदेशों को निरस्त कर दिया, जिनके आधार पर भवनों को हटाने की कार्रवाई की जा रही थी। हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में माना कि प्रशासन ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की और प्रभावित पक्षों को उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।


छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर ने WPC No. 2856/2017, Krishnanand Singh एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ शासन एवं अन्य प्रकरण में 20 अगस्त 2026 को फैसला सुनाते हुए राज्य शासन के 4 जुलाई 2012 के निर्माण हटाने संबंधी आदेश तथा नगर निगम अंबिकापुर के आयुक्त द्वारा 7 दिसंबर 2016 को जारी भवन हटाने के आदेश को निरस्त कर दिया। इस फैसले के बाद वसुंधरा सिटी के निवासियों ने इसे वर्षों के भय, असुरक्षा और मानसिक तनाव से मुक्ति के रूप में देखा है।

मामले के अनुसार, कुण्डला वसुन्धरा सिटी का विकास वसुन्धरा बिल्डर्स द्वारा संबंधित विभागों की स्वीकृतियों के आधार पर किया गया था। नगर निगम ने 8 अगस्त 2007 को भवन निर्माण की अनुमति दी थी, जबकि बाद में अतिरिक्त निर्माण अनुमति के लिए 1 फरवरी 2011 को आवेदन प्रस्तुत किया गया था। यह आवेदन न तो विधिवत निरस्त किया गया और न ही उसका अंतिम निराकरण हुआ। इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर निर्माण हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
न्यायालय के रिकॉर्ड में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण माना गया कि नगर निगम आयुक्त ने 3 अगस्त 2011 के आदेश में लंबित आवेदन और निर्माण की स्थिति का संज्ञान लेते हुए पूर्णता की ओर बढ़ रहे भवनों को पूरा करने की अनुमति दी थी। इसके बाद 140 भवनों के लिए कम्प्लीशन सर्टिफिकेट का आवेदन प्रस्तुत किया गया और रिकॉर्ड के अनुसार 4 जनवरी 2012 तक ये भवन पूर्ण हो चुके थे। वहीं शेष छह भवनों के लिए 10 फरवरी 2012 को नई अनुमति भी जारी की गई थी।
इन तथ्यों के बावजूद राज्य शासन ने 4 जुलाई 2012 को निर्माण हटाने का आदेश जारी किया और बाद में नगर निगम ने 7 दिसंबर 2016 को 110 भवन स्वामियों के खिलाफ ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू की। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भवनों की पहचान और मार्किंग की प्रक्रिया के कारण प्रभावित परिवार लगातार मानसिक दबाव और असुरक्षा के माहौल में जी रहे थे।

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि प्रशासन के समक्ष उपलब्ध महत्वपूर्ण दस्तावेजों और रिकॉर्ड पर समुचित विचार नहीं किया गया। न्यायालय ने लंबित अनुमति आवेदन, नगर निगम के पूर्व आदेश, कम्प्लीशन सर्टिफिकेट और भवनों की वास्तविक स्थिति को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि इन तथ्यों की अनदेखी कर कठोर कार्रवाई की गई।
फैसले का सबसे अहम पहलू प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर न्यायालय की टिप्पणी रही। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रभावित पक्षों को प्रभावी सुनवाई का अवसर दिए बिना उनके घरों और संपत्तियों को प्रभावित करने वाले आदेश पारित नहीं किए जा सकते। न्यायालय ने माना कि जब मूल आदेश ही विधिसम्मत नहीं है, तो उसके आधार पर नगर निगम की आगे की कार्रवाई भी टिक नहीं सकती।
इस पूरे मामले में पूर्व पार्षद आलोक दुबे की भूमिका भी चर्चा में रही। न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने वर्ष 2015 में याचिका दायर कर वर्ष 2012 के आदेश के पालन की मांग की थी, जिसके बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई आगे बढ़ी। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया का सीधा असर उन परिवारों पर पड़ा, जिन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई से घर बनाए थे।
याचिकाकर्ता कृष्णानंद सिंह ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह केवल एक मुकदमे की जीत नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों के अधिकारों और उनके आशियानों की सुरक्षा की जीत है। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने यह सिद्धांत पुनः स्थापित किया है कि प्रशासनिक निर्णय निष्पक्ष, तथ्यों पर आधारित और प्राकृतिक न्याय के अनुरूप होने चाहिए।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद कुण्डला वसुन्धरा सिटी के निवासियों में राहत और संतोष का माहौल है। नौ वर्षों से अनिश्चितता के साए में जी रहे परिवार अब इस निर्णय को अपने घरों की सुरक्षा और नागरिक अधिकारों की महत्वपूर्ण जीत के रूप में देख रहे हैं।


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