Bihar Jharkhand Water Dispute: बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर करीब ढाई दशक से चला आ रहा विवाद अब खत्म हो गया है। दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से पानी के हिस्से को लेकर मतभेद बना हुआ था। सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में बिहार और झारखंड सरकार ने इस विवाद के समाधान की दिशा में बड़ा कदम उठाया। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने सोन नदी के 77.5 लाख एकड़-फुट पानी के बंटवारे को लेकर समझौता ज्ञापन यानी MoU पर हस्ताक्षर किए।
दोनों राज्यों ने MoU पर किए हस्ताक्षर
समझौते के दौरान झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी मौजूद रहे। कार्यक्रम में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल, बिहार के उपमुख्यमंत्री, केंद्रीय गृह सचिव तथा केंद्र और दोनों राज्यों के कई वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए। इस समझौते को बिहार और झारखंड के बीच जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
लाखों किसानों को मिलेगा सीधा फायदा
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समझौते के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इसकी जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि सोन नदी के पानी के बंटवारे पर बनी सहमति से बिहार और झारखंड की बड़ी आबादी को सिंचाई और पेयजल की बेहतर सुविधा मिल सकेगी। इसका सीधा लाभ दोनों राज्यों के लाखों किसानों को मिलने की उम्मीद है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में विकास और कृषि गतिविधियों को भी नई गति मिल सकती है।
ग्रामीण विकास और पेयजल व्यवस्था होगी मजबूत
अमित शाह ने कहा कि पानी के इस समझौते से दोनों राज्यों के बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में सिंचाई से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों में पेयजल आपूर्ति को लेकर लंबे समय से चली आ रही चुनौतियों का समाधान भी संभव होगा। समझौते को दोनों राज्यों के लिए दीर्घकालिक और स्थायी समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
सहकारी संघवाद की मिसाल बताया समझौता
समारोह को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि करीब 25 वर्षों से लंबित जल विवाद का बातचीत के जरिए समाधान होना सहकारी संघवाद की भावना को मजबूत करता है। उनके अनुसार, जब केंद्र और राज्य मिलकर किसी समस्या का समाधान तलाशते हैं तो लंबे समय से लंबित मुद्दों को भी सुलझाया जा सकता है। उन्होंने राज्यों से टीम भावना के साथ आगे बढ़ने की अपील की।
1973 के समझौते से जुड़ी है विवाद की जड़
सोन नदी के जल बंटवारे का इतिहास काफी पुराना है। वर्ष 1973 में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और तत्कालीन अविभाजित बिहार के बीच सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर एक समझौता हुआ था। इसी समझौते में मध्य प्रदेश में बाणसागर बांध परियोजना की लागत से जुड़े प्रावधान भी शामिल थे। बाद में बिहार के विभाजन के कारण परिस्थितियां बदल गईं और जल बंटवारे का मुद्दा विवाद में बदल गया।
झारखंड बनने के बाद बढ़ा विवाद
वर्ष 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड नया राज्य बना। इसके बाद सोन नदी के पानी के हिस्से को लेकर दोनों राज्यों के बीच मतभेद सामने आने लगे। झारखंड का तर्क था कि बाणसागर परियोजना के जलग्रहण क्षेत्र का बड़ा हिस्सा उसके क्षेत्र में आता है, इसलिए उसे पानी में अधिक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। वहीं बिहार ने अपने दावे के समर्थन में 1973 के पुराने समझौते का हवाला दिया।
बाणसागर परियोजना बना था विवाद का केंद्र
अधिकारियों के मुताबिक, झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद बाणसागर परियोजना से मिलने वाले पानी के हिस्से को लेकर दोनों राज्यों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। एक तरफ झारखंड जलग्रहण क्षेत्र में अपने भौगोलिक योगदान के आधार पर अधिक पानी की मांग कर रहा था, जबकि बिहार पुराने अंतरराज्यीय समझौते के आधार पर अपने हिस्से को उचित बता रहा था। इसी वजह से विवाद वर्षों तक लंबा खिंचता रहा।
सिंचाई और पेयजल के लिए अहम समझौता
अब 77.5 लाख एकड़-फुट सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर हुए MoU से दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से चली आ रही अनिश्चितता खत्म होने की उम्मीद है। पानी की उपलब्धता और वितरण को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनने से किसानों को सिंचाई की बेहतर सुविधा मिल सकती है। इसके अलावा पेयजल योजनाओं को भी स्थिर जल स्रोत उपलब्ध कराने में मदद मिलने की संभावना है।
बिहार और झारखंड के विकास को मिलेगी गति
सोन नदी के जल बंटवारे का यह समझौता केवल पानी के हिस्से तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पेयजल व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है। दोनों राज्यों में बड़ी आबादी कृषि और ग्रामीण गतिविधियों पर निर्भर है। ऐसे में जल संसाधन के बेहतर और निर्धारित उपयोग से किसानों की उत्पादकता बढ़ाने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में विकास योजनाओं को गति देने में मदद मिल सकती है।
बातचीत से निकला 25 साल पुराने विवाद का रास्ता
करीब 25 वर्षों तक चले इस विवाद का समाधान केंद्र और दोनों राज्य सरकारों के बीच बातचीत के बाद संभव हुआ है। समझौते के बाद उम्मीद है कि सोन नदी के जल संसाधन का इस्तेमाल दोनों राज्यों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अधिक व्यवस्थित तरीके से किया जाएगा। यह समझौता बिहार और झारखंड के बीच सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ अंतरराज्यीय जल विवादों को बातचीत और सहमति के जरिए सुलझाने की एक महत्वपूर्ण मिसाल भी बन सकता है।
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