CG PWD Tender Scam
CG PWD Tender Scam: छत्तीसगढ़ के लोक निर्माण विभाग (PWD) की विद्युत एवं यांत्रिकी शाखा से भ्रष्टाचार और भारी लापरवाही का एक बड़ा मामला प्रकाश में आया है। बिलासपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड द्वारा पांच वर्षों की लंबी अवधि के लिए आधिकारिक रूप से ब्लैकलिस्ट की जा चुकी एक दागी कंपनी को विभाग ने नियमों को ताक पर रखकर लगभग 13 करोड़ रुपये के भारी-भरकम सरकारी ठेके आवंटित कर दिए। मुख्य आरोप यह है कि संबंधित कंपनी ने टेंडर प्रक्रिया के दौरान एक पूरी तरह से झूठा शपथपत्र (Affidavit) जमा कर खुद को बेदाग और “क्लीन” बताया था। वहीं, विभागीय अधिकारियों ने भी बिना किसी कड़े भौतिक और दस्तावेजी सत्यापन के उस फर्जी दावे को तुरंत मान्य कर लिया। अब यह पूरा मामला सामने आने के बाद राज्य की सरकारी टेंडर प्रक्रिया, वित्तीय निगरानी और विभागीय पारदर्शिता पर बेहद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
आधिकारिक दस्तावेजों और रिपोर्ट्स के अनुसार, ‘श्री कृष्णा इंफ्रा डेवलपर’ नाम की कंपनी को वर्ष 2023 में बिलासपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने नियमों के उल्लंघन के चलते उसकी निविदा सुरक्षा राशि (EMD) को जब्त करते हुए पांच साल के लिए पूरी तरह से ब्लैकलिस्ट कर दिया था। इसके साथ ही कंपनी को भविष्य की सभी निविदा प्रक्रियाओं से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। इसके बावजूद, शातिर कंपनी ने नए टेंडरों में शामिल होने के लिए स्टांप पेपर पर झूठा हलफनामा दिया कि वह किसी भी सरकारी संस्थान या विभाग में प्रतिबंधित नहीं है। अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही उठ रहा है कि जब नियम और शर्तें पूरी तरह स्पष्ट थीं, तब विभागीय स्तर पर टेंडर कमेटी द्वारा इस झूठे दावे का बारीकी से सत्यापन क्यों नहीं किया गया?
विभागीय छानबीन और सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस ब्लैकलिस्टेड कंपनी को राज्य के अलग-अलग महत्वपूर्ण जिलों में बड़े पैमाने पर विद्युत कार्य सौंपे गए थे, जिनका विवरण इस प्रकार है:
रायपुर, धमतरी और कुरूद क्षेत्र: इन इलाकों में बिजली लाइन की शिफ्टिंग और व्यापक विद्युतीकरण के लिए लगभग 6 करोड़ रुपये का बड़ा ठेका दिया गया।
बिलासपुर संभाग: यहां के खेल परिसर के निर्माण और विद्युत नवीनीकरण (Renovation) कार्य के लिए करीब 4.87 करोड़ रुपये का काम सौंपा गया।
नवा रायपुर और महासमुंद क्षेत्र: इन वीआईपी क्षेत्रों में सड़क चौड़ीकरण के दौरान बिजली लाइनों को हटाने और शिफ्ट करने का लगभग 2.15 करोड़ रुपये का कार्य दिया गया।
इस प्रकार, विभिन्न जिलों को मिलाकर कुल मिलाकर लगभग 13 करोड़ रुपये के महत्वपूर्ण और संवेदनशील सरकारी काम इस डिबार की गई कंपनी की झोली में डाल दिए गए।
लोक निर्माण विभाग के टेंडर नियमों में साफ तौर पर यह उल्लिखित है कि किसी भी ब्लैकलिस्टेड या डिबार किए गए ठेकेदार को कोई भी सरकारी काम आवंटित नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद इस दागी कंपनी को तकनीकी रूप से ‘पात्र’ मान लिया गया। यही कारण है कि विशेषज्ञ अब इस पूरे मामले को महज एक सामान्य तकनीकी गलती नहीं, बल्कि अधिकारियों और ठेकेदार के बीच एक सोची-समझी संभावित मिलीभगत और बड़े भ्रष्टाचार की दिशा में देख रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, स्टांप पेपर पर जानबूझकर झूठा शपथपत्र देना जालसाजी, धोखाधड़ी और शासन को गुमराह करने की गंभीर श्रेणी में आता है। भारतीय कानून के तहत ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर 3 से 7 साल तक की सश्रम जेल की सजा और भारी आर्थिक जुर्माने का सख्त प्रावधान है।
इस पूरे टेंडर विवाद पर जब पीडब्ल्यूडी (विद्युत एवं यांत्रिकी) शाखा के सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर सुरेश भूप्पल से सवाल किया गया, तो उन्होंने बेहद गैर-जिम्मेदाराना रुख अपनाते हुए कहा कि किसी दूसरे विभाग द्वारा कंपनी को ब्लैकलिस्ट किए जाने की जानकारी उनके विभाग को भला कैसे हो सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि शपथपत्र झूठा पाया गया है, तो कंपनी संचालक पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। वहीं, विभाग के प्रमुख अभियंता (ENC) वीके भतपहरी ने मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने का भरोसा दिया है।
लेकिन इन शीर्ष अधिकारियों के बयानों के बाद जनता और मीडिया के सवाल और गहरे हो गए हैं कि जब करोड़ों रुपये के जनहित के टेंडर बांटे जा रहे थे, तब कागजात की जांच करने वाली प्रणाली आखिर कैसे फेल हो गई? क्या टेंडर की जिम्मेदारी संभाल रहे अफसरों को कंपनी की असलियत पहले से पता थी? यदि नहीं पता थी, तो विभाग की टेंडर सत्यापन प्रणाली इतनी कमजोर क्यों है? अब सभी की निगाहें आने वाली निष्पक्ष जांच पर टिकी हैं, क्योंकि यह मामला सिर्फ एक फर्जी शपथपत्र का नहीं, बल्कि पूरे सरकारी सिस्टम की विश्वसनीयता का बन चुका है।
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