Chhattisgarh Cabinet Extension : छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल विस्तार की तारीख़ बार-बार खिसक रही है। मुख्यमंत्री जब-जब दिल्ली से लौटते हैं, वही रटा-रटाया बयान दोहराते हैं “जल्द ही विस्तार होगा”। लेकिन “जल्द” की यह घड़ी कब आएगी, कोई नहीं जानता। असलियत यह है कि भाजपा सरकार के भीतर गुटबाज़ी इतनी गहरी हो चुकी है कि नामों की सूची आलाकमान तक पहुँचते ही बदल जाती है।

गुटों की खींचतान में फंसा विस्तार
भाजपा सरकार बने महीनों हो गए, पर कैबिनेट अधूरा ही है। वजह सिर्फ एक, पार्टी के भीतर आपसी खींचतान। वरिष्ठ बनाम नए चेहरे, क्षेत्रीय समीकरण बनाम जातीय संतुलन और संगठन बनाम सरकार की खींचतान ने स्थिति उलझा दी है। सबसे बड़ा सवाल है अग्रवाल समाज का प्रतिनिधित्व। बृजमोहन अग्रवाल को लोकसभा भेजकर मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया। अब यह समाज एक बार फिर कैबिनेट में अपनी जगह चाहता है। बिलासपुर के पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन उनके नाम पर ही सबसे ज्यादा अड़चनें खड़ी की जा रही हैं।

अमर अग्रवाल बनाम अरुण साव और ओपी चौधरी
सूत्रों की मानें तो उपमुख्यमंत्री अरुण साव और वित्त मंत्री ओपी चौधरी, दोनों ही अमर अग्रवाल की वापसी से सहज नहीं हैं। यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस छोड़ भाजपा में आये और अंबिकापुर से तत्कालीन उपमुख्यंत्री टीएस सिंह को हराकर पहली बार विधायक बने राजेश अग्रवाल का नाम चलाया।मीडिया रिपोर्टिंग में राजेश अग्रवाल का मंत्री बनना तय हो गया था अंतिम समय मे उनकी जगह फिर से अमर अग्रवाल का नाम समाचारों की सुर्खियां बनी।
अरुण साव की आशंका:
अमर के मंत्री बनने से बिलासपुर में उनकी राजनीतिक पकड़ ढीली पड़ सकती है।
ओपी चौधरी की चिंता:
अमर अग्रवाल वित्त के जानकार हैं और रमन सरकार में वित्त विभाग संभाल चुके हैं। ऐसे में डर है कि आलाकमान वित्त विभाग फिर से अमर को सौंप सकता है।
दिलचस्प यह है कि ओपी चौधरी रायगढ़ से आते हैं, वही ज़िला जहाँ अमर अग्रवाल की जन्मभूमि और उनके पिता स्व. लखीराम अग्रवाल की राजनीतिक विरासत मौजूद है। यानी टकराव सिर्फ मंत्री पद का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय प्रभुत्व का भी है।
मीडिया युद्ध
स्थिति यहां तक पहुँच चुकी है कि सभी दावेदार अपने-अपने समर्थक पत्रकारों और पोर्टलों के जरिए खबरें “प्लांट” करवा रहे हैं। एक-दूसरे के खिलाफ अफवाहें उड़ाई जा रही हैं, ताक़ि आलाकमान पर दबाव डाला जा सके। सबसे पहले राजेश अग्रवाल के खिलाफ खबर चली कि अडानी समूह उन्हें मंत्री बनाकर केते हसदेव जंगल कटने की राह आसान करना चाहता है। फिर एक चर्चित अधिवक्ता का नाम पद्मश्री के लिए अनुशंसित करने को लेकर उनकी किरकिरी हुई। यानी लड़ाई अब बंद कमरे से बाहर निकलकर मीडिया की सुर्खियों में उतर चुकी है।
आलाकमान की दुविधा
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इस गुटबाज़ी को भली-भांति समझ रहा है, लेकिन निर्णय टालकर दोनों पक्षों को संतुलित रखने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि शपथ ग्रहण की तारीख़ हर बार नज़दीक आकर फिर दूर चली जाती है।
अब सवाल यह है कि आलाकमान कब और कैसे इस “संतुलन साधने की कला” में कामयाब होगा। पर एक बात साफ़ है—मंत्रिमंडल विस्तार में जितनी देरी होगी, उतनी ही गहराई से भाजपा के भीतर की गुटबाज़ी जनता के सामने उजागर होती जाएगी।
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