Sakti Joba Ashram : छत्तीसगढ़ के नवनिर्मित सक्ती जिले के अंतर्गत आने वाले सुप्रसिद्ध जोबा आश्रम में एक बेहद दुर्लभ और ऐतिहासिक ताम्रपत्र मिलने की खबर ने क्षेत्र के इतिहासकार और पुरातत्व प्रेमियों को रोमांचित कर दिया है। इस प्राचीन ताम्रपत्र पर उत्कल लिपि (ओड़िका की प्राचीन लिपि) में रहस्यमयी लेख अंकित हैं। शुरुआती पड़ताल के बाद जानकारों का अनुमान है कि इस ऐतिहासिक दस्तावेज का सीधा संबंध प्राचीन काल की गुप्त तंत्र साधनाओं और उच्च आध्यात्मिक परंपराओं से हो सकता है। जैसे ही इस अद्भुत पुरातात्विक धरोहर की सूचना स्थानीय जिला प्रशासन को मिली, प्रशासनिक महकमे ने बिना वक्त गंवाए इसके विधिवत संरक्षण और गहन अध्ययन की कागजी और जमीनी प्रक्रिया शुरू कर दी है।

प्रशासनिक टीम ने किया निरीक्षण, विशेषज्ञों से लिया जाएगा परामर्श
ताम्रपत्र की प्राप्ति और इसके ऐतिहासिक महत्व की भनक लगते ही सक्ती जिले के डिप्टी कलेक्टर अरुण कुमार सोम अपनी एक विशेष टीम के साथ फौरन जोबा आश्रम पहुंचे। वहां उन्होंने पूरी सतर्कता के साथ इस ऐतिहासिक और अमूल्य धरोहर का बारीकी से अवलोकन किया। प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि यह खोज छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा हो सकती है। अब जिला प्रशासन इस ताम्रपत्र के गूढ़ रहस्यों, इसके सटीक कालखंड और इस पर लिखे वाक्यों का सही अर्थ समझने के लिए पुरातत्व विभाग के बड़े विशेषज्ञों और लिपि वैज्ञानिकों की मदद लेने की पूरी तैयारी कर रहा है।

गुरु परंपरा से मिला अमूल्य खजाना, आयु को लेकर सस्पेंस बरकरार
जोबा आश्रम स्थित महाकाली मंदिर के मुख्य पुजारी और आश्रम के प्रमुख स्वामी दिव्यानंद ओम महाराज ने इस संबंध में एक बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि यह ऐतिहासिक ताम्रपत्र उन्हें अपनी प्राचीन गुरु शिष्य परंपरा के माध्यम से विरासत के रूप में प्राप्त हुआ है। यह पवित्र ताम्रपत्र पिछले कई दशकों या शायद सदियों से आश्रम के गुप्त कक्ष में पूरी तरह सुरक्षित रखा गया था, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी संत इसकी पूरी निष्ठा के साथ देखरेख करते आ रहे हैं। हालांकि, स्वामी दिव्यानंद ने यह भी स्पष्ट किया कि इस ताम्रपत्र की वास्तविक आयु या इसके निर्माण काल से जुड़ा कोई भी लिखित दस्तावेज वर्तमान में आश्रम के पास उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसकी अनूठी बनावट, अक्षरों की लेखन शैली और उत्कल लिपि को देखकर यह साफ हो जाता है कि यह सदियों पुराना और अत्यंत दुर्लभ है।
प्राचीन काल में ज्ञान और राजकीय संदेशों को सहेजने का माध्यम थे ताम्रपत्र
इतिहास और संस्कृति के जानकारों के मुताबिक, प्राचीन और मध्यकालीन भारत में ताम्रपत्रों (तांबे की प्लेटों) का उपयोग बहुत ही विशिष्ट कार्यों के लिए किया जाता था। उस दौर में महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथों, गुप्त तंत्र साधना के सूत्रों, अद्वितीय ज्ञान-विज्ञान, राजाओं के विजय संदेशों, राजकीय आदेशों और भूमि दान से जुड़ी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारियों को स्थायी रूप से सुरक्षित रखने के लिए तांबे पर उकेरा जाता था। यही वजह है कि आज के समय में ऐसे धातु अभिलेख किसी भी क्षेत्र के लुप्त हो चुके इतिहास, सामाजिक ताने-बाने और पुरानी संस्कृति को पुनर्जीवित करने और समझने में सबसे प्रामाणिक और महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रशासनिक संरक्षण की पहल का साधु-संतों और प्रबुद्ध वर्ग ने किया स्वागत
जिला प्रशासन द्वारा इस दुर्लभ पुरातात्विक धरोहर को अपने संरक्षण में लेने और इसके वैज्ञानिक अध्ययन की दिशा में उठाए गए कदमों की चौतरफा सराहना हो रही है। इसे सक्ती जिले की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है। आश्रम प्रमुख स्वामी दिव्यानंद ओम महाराज ने कहा कि सरकार और प्रशासन द्वारा प्राचीन विरासतों के संरक्षण के लिए चलाए जा रहे इन ईमानदार प्रयासों के कारण ही आज देशभर में छिपी हुई कई दुर्लभ पांडुलिपियां, ताम्रपत्र और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज समाज के सामने आ पा रहे हैं, जो हमारी आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेंगे।

विशेषज्ञ बोले- सक्ती जिले के ऐतिहासिक गौरव में जुड़ा एक नया स्वर्णिम अध्याय
पुरातत्व और इतिहास के गहरे जानकार हरिओम अग्रवाल ने इस अभूतपूर्व खोज को सक्ती जिले के लिए एक गौरवपूर्ण और ऐतिहासिक उपलब्धि करार दिया है। उन्होंने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि किसी भी क्षेत्र या जिले की वास्तविक पहचान केवल उसकी आधुनिक सड़कों और भौतिक विकास से नहीं आंकी जाती, बल्कि उसकी सदियों पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत की गहराई से तय होती है। उन्होंने जोबा आश्रम के संतों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने इतने वर्षों तक इस अनमोल धरोहर को नष्ट होने से बचाकर सुरक्षित रखा, जो अपने आप में एक बड़ा योगदान है।
वैज्ञानिक और पुरातात्विक अध्ययन से सामने आ सकते हैं कई चौंकाने वाले तथ्य
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का दृढ़ विश्वास है कि यदि इस ताम्रपत्र का आधुनिक तकनीकों से वैज्ञानिक परीक्षण (जैसे कार्बन डेटिंग) और विस्तृत पुरातात्विक अध्ययन कराया जाए, तो इसकी वास्तविक उत्पत्ति का समय, इसे बनाने का मुख्य उद्देश्य और इसके ऐतिहासिक महत्व से जुड़े कई ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं जो अब तक इतिहास के पन्नों में दफन हैं। उत्कल लिपि में लिखे गए ऐसे प्राचीन अभिलेख दो अलग-अलग राज्यों या क्षेत्रों के बीच पुराने समय में रहे सांस्कृतिक, व्यापारिक और धार्मिक संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने में मदद करते हैं।
जनसहयोग और साधना का पवित्र केंद्र रहा है जोबा आश्रम
जोबा आश्रम की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए आश्रम से जुड़े पंडित देवेंद्र अग्निहोत्री ने बताया कि यह पावन स्थल लंबे समय से केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निस्वार्थ मानव सेवा, आध्यात्मिक चेतना और कठिन साधना का एक बड़ा केंद्र बना हुआ है। आश्रम की तमाम व्यवस्थाएं और समाज कल्याण के कार्य यहां आने वाले श्रद्धालुओं और स्थानीय जनता के स्वैच्छिक सहयोग से ही सुचारू रूप से संचालित होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि स्वामी दिव्यानंद ओम महाराज स्वयं वर्षों से इस अंचल में विभिन्न धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक उत्थान के कार्यों में पूरी सक्रियता से जुटे हुए हैं।
भविष्य में पर्यटन और शोध के क्षेत्र में जिले की नई पहचान बनेगा यह ताम्रपत्र
वर्तमान परिदृश्य को देखें तो जोबा आश्रम में सुरक्षित मिला यह ताम्रपत्र अब केवल पूजा-पाठ या धार्मिक श्रद्धा की कोई वस्तु नहीं रह गया है। यह सक्ती जिले की प्राचीन ऐतिहासिक समृद्धि और सांस्कृतिक भव्यता का एक जीवंत प्रतीक बनकर दुनिया के सामने उभरा है। पुरातत्वविदों का मानना है कि यदि शासन स्तर पर इसके संरक्षण, जीर्णोद्धार और उच्च स्तरीय शोध कार्य को पूरी गंभीरता के साथ आगे बढ़ाया जाता है, तो यह अनूठी खोज भविष्य में सक्ती जिले को न केवल छत्तीसगढ़ में, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान तथा ऐतिहासिक पर्यटन के क्षेत्र में एक नई और विशिष्ट पहचान दिला सकती है।
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