Chhattisgarh UCC committee
Chhattisgarh UCC committee : छत्तीसगढ़ की राजनीति में बुधवार का दिन एक बड़े बदलाव की आहट लेकर आया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में राज्य सरकार ने ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) का प्रारूप तैयार करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति के गठन का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इस फैसले के साथ ही राज्य में सामाजिक और कानूनी सुधारों को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। सरकार का तर्क है कि यह कदम न्याय प्रणाली में समानता लाएगा, जबकि विपक्ष ने इसे आदिवासी अधिकारों पर हमला करार दिया है।
कैबिनेट के निर्णय के अनुसार, उत्तराखंड में UCC का मसौदा तैयार करने वाली सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई छत्तीसगढ़ में भी इस समिति का नेतृत्व करेंगी। यह समिति केवल सरकारी स्तर पर काम नहीं करेगी, बल्कि यह आम नागरिकों, कानूनी विशेषज्ञों, सामाजिक संस्थाओं और विभिन्न धार्मिक संगठनों के साथ संवाद स्थापित करेगी। समिति का मुख्य कार्य सभी पक्षों के सुझावों को संकलित कर एक ऐसा विस्तृत मसौदा तैयार करना है, जिसे बाद में विधिवत रूप से राज्य विधानसभा में चर्चा के लिए पेश किया जा सके।
वर्तमान में देश के अन्य हिस्सों की तरह छत्तीसगढ़ में भी विवाह, तलाक, गोद लेने और संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामले अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ के आधार पर तय होते हैं। सरकार का मानना है कि इन विविध कानूनों के कारण न्याय प्रक्रिया जटिल हो जाती है। यूसीसी का उद्देश्य इन जटिलताओं को समाप्त कर एक सरल और एकसमान व्यवस्था लागू करना है। सरकार के मुताबिक, इस कानून के आने से न्याय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी और विशेष रूप से महिलाओं को उनके पैतृक और वैवाहिक अधिकारों में बराबरी का स्थान मिल सकेगा।
सरकार के इस फैसले पर विपक्षी दल कांग्रेस ने कड़ा ऐतराज जताया है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के मीडिया चेयरमैन सुशील आनंद शुक्ला ने इस कदम को आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ बताया है। कांग्रेस का तर्क है कि छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहाँ आदिवासियों के लिए ‘पेसा’ (PESA) कानून और संविधान की पांचवीं अनुसूची प्रभावी है। विपक्ष का कहना है कि आदिवासियों की अपनी विशिष्ट परंपराएं और रूढ़िवादी कानून हैं, जिन्हें यूसीसी के जरिए खत्म करने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस ने इसे भाजपा की विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा करार दिया है।
कांग्रेस के आरोपों पर भाजपा ने भी तीखा प्रहार किया है। भाजपा प्रवक्ता अनुराग अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस केवल ‘तुष्टिकरण’ की राजनीति कर रही है। उन्होंने तर्क दिया कि रंजना प्रकाश देसाई द्वारा तैयार किए गए उत्तराखंड के ड्राफ्ट में आदिवासियों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है, ताकि उनकी विशिष्ट संस्कृति और पहचान अक्षुण्ण रहे। भाजपा का दावा है कि छत्तीसगढ़ में भी आदिवासियों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा और कांग्रेस केवल समुदाय विशेष के हितों को साधने के लिए आदिवासियों के नाम का सहारा ले रही है।
समान नागरिक संहिता का मुद्दा अब छत्तीसगढ़ की गलियों से लेकर विधानसभा तक गूंजने वाला है। एक ओर जहाँ साय सरकार इसे ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका न्याय’ की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं आदिवासी बहुल क्षेत्रों में इसे लेकर संशय पैदा करने की कोशिशें भी जारी हैं। आने वाले समय में रंजना देसाई समिति की रिपोर्ट और उसमें आदिवासियों को लेकर किए गए प्रावधान ही यह तय करेंगे कि छत्तीसगढ़ में इस कानून का भविष्य क्या होगा। फिलहाल, इस फैसले ने राज्य की सियासी तपिश को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।
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