Hormuz security mission
Hormuz security mission : अमेरिका और ईरान के बीच पिछले एक महीने से जारी भीषण सैन्य संघर्ष ने वैश्विक व्यापारिक मार्गों को खतरे में डाल दिया है। इस संकट को देखते हुए अब यूरोपीय देशों ने एक नई और स्वतंत्र रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। यूरोपीय संघ (EU) होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक ‘स्वतंत्र रणनीतिक सुरक्षा मिशन’ शुरू करने की तैयारी कर रहा है। इस मिशन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें अमेरिका को शामिल नहीं किया जाएगा। यह कदम मुख्य रूप से शांति बहाल होने के बाद समुद्री व्यापार में विश्वास पैदा करने के लिए उठाया जा रहा है, ताकि विश्व की इस महत्वपूर्ण व्यापारिक धमनी को फिर से संचालित किया जा सके।
‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस नए सुरक्षा प्रस्ताव का खाका ब्रिटेन और फ्रांस की देखरेख में तैयार किया जा रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट किया है कि यह मिशन पूरी तरह से रक्षात्मक (Defensive) होगा और यह अमेरिकी सैन्य कमान के अधीन काम नहीं करेगा। इस अंतरराष्ट्रीय गठबंधन से उन सभी देशों को बाहर रखा गया है जो वर्तमान संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल हैं, जिनमें अमेरिका, इजरायल और ईरान प्रमुख हैं। इसका उद्देश्य शिपिंग कंपनियों को यह भरोसा दिलाना है कि युद्ध विराम के बाद इस मार्ग का उपयोग करना पूरी तरह सुरक्षित है। इस योजना की सफलता के लिए ईरान और ओमान जैसे क्षेत्रीय देशों का सहयोग लेने पर भी विचार किया जा रहा है।
यूरोपीय देशों द्वारा प्रस्तावित इस सुरक्षा योजना के तीन बुनियादी स्तंभ तय किए गए हैं। पहला मुख्य उद्देश्य उन सैकड़ों व्यापारिक जहाजों के लिए सुरक्षित ‘लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर’ तैयार करना है, जो वर्तमान में संघर्ष के कारण इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं। दूसरा और सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य समुद्र के पानी में बिछाई गई घातक ‘माइंस’ (Mines) को हटाना है। तीसरा उद्देश्य व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित रास्ता प्रदान करने के लिए ‘नेवल एस्कॉर्ट्स’ (युद्धपोतों का साथ) तैनात करना है। इन कदमों के बिना अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक कंपनियां इस खतरनाक मार्ग पर अपने जहाज भेजने को तैयार नहीं हैं।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज के पानी को बारूदी सुरंगों या माइंस से मुक्त करना एक समय लेने वाली और जोखिम भरी प्रक्रिया होगी। हालांकि, यह भी माना जाता है कि समुद्री माइंस को खोजने और नष्ट करने के मामले में यूरोपीय देशों के पास अमेरिका की तुलना में अधिक उन्नत और विशिष्ट तकनीकी क्षमता है। यूरेशिया समूह के विश्लेषक मुजतबा रहमान के अनुसार, केवल माइंस हटाना ही काफी नहीं होगा; जब तक एक मजबूत एस्कॉर्ट सिस्टम जहाजों के साथ नहीं चलेगा, तब तक बीमा कंपनियां और शिपिंग मालिक इस मार्ग पर वापस नहीं लौटेंगे।
यह नया प्रस्ताव वाशिंगटन और ब्रुसेल्स के बीच बढ़ती कूटनीतिक दूरी का प्रमाण है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में होर्मुज स्ट्रेट को बलपूर्वक खोलने की वकालत की थी, जिसका यूरोपीय नेताओं ने कड़ा विरोध किया है। यूरोप का मानना है कि अमेरिका का यह आक्रामक रुख स्थिति को और बिगाड़ सकता है, जिससे व्यापारिक जहाजों पर मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ जाएगा। इसी कारण यूरोपीय देशों ने एक ऐसी सुरक्षा व्यवस्था चुनी है जो अमेरिकी आक्रामकता से मुक्त हो और कूटनीतिक रूप से अधिक तटस्थ नजर आए।
इस महत्वपूर्ण चर्चा में चीन और भारत जैसे प्रमुख एशियाई देशों को भी विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है, इसलिए भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए इस मार्ग का बंद होना किसी बड़ी आर्थिक आपदा से कम नहीं है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि भारत और चीन इस यूरोपीय गठबंधन का हिस्सा बनेंगे या अपना स्वतंत्र रुख अपनाएंगे। बहरहाल, यूरोप की यह पहल दर्शाती है कि वैश्विक सुरक्षा के समीकरण अब तेजी से बदल रहे हैं और अमेरिका की एकतरफा नीतियों के विकल्प तलाशे जा रहे हैं।
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