CISF Posting Policy
CISF Posting Policy: देश की लोकतांत्रिक नींव, संसद भवन, की 24 घंटे सुरक्षा में तैनात रहने वाले केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) ने अपनी पोस्टिंग पॉलिसी में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया है। इस बदलाव का दोहरा उद्देश्य है: पहला, सुरक्षाकर्मियों, जवानों से लेकर अधिकारियों तक में नया जोश भरना, और दूसरा, बल की परिचालन दक्षता को मजबूत करना। यह संशोधन उस समय आया है जब अग्निवीरों के पहले बैच का कार्यकाल समाप्त होने वाला है, और ‘अग्निवीर’ भर्ती नीति के अनुसार, CISF को अपने विभाग में कुल जवानों में से 10 प्रतिशत को भर्ती करना अनिवार्य है। CISF का यह कदम बल की तैयारियों को अपडेट करने और सुरक्षा मानकों में निरंतर सुधार सुनिश्चित करने के व्यापक लक्ष्य को दर्शाता है।
पोस्टिंग नीति में किए गए इस संशोधन को CISF में जवानों की तैनाती और संख्या बल को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। CISF के वरिष्ठ कमांडेंट ने बताया कि नई पॉलिसी के तहत, संसद भवन की सुरक्षा में तैनात जवानों की सेवा अवधि में एक साल की बढ़ोतरी कर दी गई है। इसका मतलब है कि जवानों की तैनाती अब 3 साल की जगह 4 साल तक रहेगी। इसके साथ ही, जवानों के उत्कृष्ट प्रदर्शन (परफॉर्मेंस) को देखते हुए, उनके कार्यकाल को एक और साल के लिए, यानी अधिकतम पाँच साल तक बढ़ाया जा सकता है। यह नियम न केवल अनुभवी कर्मियों को संवेदनशील स्थान पर बनाए रखेगा, बल्कि कर्मचारियों को बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित भी करेगा।
नई व्यवस्था के अंतर्गत, संसद की सुरक्षा में तैनाती के लिए गजटेड और नॉन-गजटेड अधिकारियों/कर्मियों के लिए अलग-अलग और कठोर मापदंड निर्धारित किए गए हैं। संसद सुरक्षा में तैनाती चाहने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल (PHC) ड्यूटी में तैनात कर्मचारियों के सर्विस रिकॉर्ड की गहनता से जाँच की जाएगी। यदि रिकॉर्ड उत्कृष्ट पाया जाता है, तो उनके कार्यकाल को बढ़ाने के साथ ही उन्हें संसद भवन में तैनात किया जाएगा। नॉन-गजटेड कर्मियों के लिए यह अनिवार्य होगा कि उनके पूरे करियर में अनुशासन से संबंधित कोई बड़ी कार्रवाई न हुई हो। यह चयन प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि केवल उच्चतम निष्ठा और अनुशासित कर्मियों को ही संसद जैसे अति-संवेदनशील स्थान पर सेवा का अवसर मिले।
संसद भवन की सुरक्षा में तैनाती की इच्छा रखने वाले सभी कर्मियों और भविष्य के अग्निवीरों को अब 4 प्रकार के विशेष टेस्ट की अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा। इन मापदंडों को लाने का मुख्य उद्देश्य भविष्य में संसद की सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य बनाना और संभावित खतरों के प्रति कर्मियों की तैयारी को परखना है।
इन चार अनिवार्य टेस्ट में शामिल हैं:
साइकोलॉजिकल टेस्ट (मनोवैज्ञानिक परीक्षण): मानसिक दृढ़ता और दबाव झेलने की क्षमता का आकलन।
फिजिकल एफिशिएंसी टेस्ट (शारीरिक दक्षता परीक्षण): शारीरिक फिटनेस और युद्ध तत्परता की जाँच।
इंटरनल ट्रेनिंग (आंतरिक प्रशिक्षण): विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल और सामरिक अभ्यास।
कानूनी क्लीयरेंस (Legal Clearance): तैनाती से पहले सभी कानूनी और सुरक्षागत बाधाओं को दूर करना।
यह सुनिश्चित करेगा कि भर्ती किए जाने वाले नए अग्निवीर भी संसद के प्रति आवश्यक बौद्धिक समझ और समर्पण रखते हों।
अधिकारी स्तर पर तैनाती के लिए CISF ने और भी सख्त मापदंड तैयार किए हैं। चुने गए अधिकारियों को कई तरह के विशेष परीक्षणों से गुजरना होगा, जिनमें विभिन्न प्रकार के हमलों से निपटने की उनकी क्षमता का आकलन किया जाएगा।
इन परीक्षणों में शामिल हैं:
जैविक और रासायनिक लड़ाई से निपटना।
आतंकी हमलों और ड्रोन हमलों का मुकाबला करना।
साइबर हमलों के दौरान सुरक्षा बनाए रखना।
बम से उड़ाने की धमकियों जैसी आपात स्थितियों से निपटना।
इस चरण के बाद, अधिकारियों का फायरिंग टेस्ट भी लिया जाएगा, जिसमें कम रोशनी या अंधेरे में उनकी निशानेबाजी क्षमता को परखा जाएगा। CISF ने यह नीति इसलिए अपनाई है ताकि साल 2023 जैसी सुरक्षा चूक की घटना दोबारा न हो सके।
यह नया सुरक्षा प्रोटोकॉल 13 दिसंबर 2023 की उस घटना के बाद आया है, जब दो युवक दर्शक दीर्घा (पब्लिक वेल) में कूद गए थे और सरकार विरोधी नारे लगाते हुए पीले रंग का धुआँ छोड़ रहे थे। इस घटना को साल 2001 के संसद हमले के बाद सुरक्षा में सबसे बड़ी चूक माना गया था। इसके अलावा, साल 2014 में भी सुरक्षा चूक हुई थी, जब एक पूर्व प्रधानमंत्री के बॉडीगार्ड हथियार के साथ संसद में प्रवेश कर गए थे, जिसे बाद में मानवीय भूल बताकर माफी माँगी गई थी। नई और कठोर पोस्टिंग व प्रशिक्षण नीति का उद्देश्य भविष्य में ऐसी सभी सुरक्षा खामियों को दूर करना है।
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