Death Penalty India : मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने के मौजूदा तरीके को खत्म करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए इसे खारिज कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि याचिका खारिज किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में इस व्यवस्था की संवैधानिक समीक्षा नहीं हो सकती। अदालत ने केंद्र सरकार के लिए भी वैकल्पिक तरीकों पर विचार करने का रास्ता खुला रखा है।
केंद्र सरकार चाहे तो कर सकती है व्यापक समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि याचिका का खारिज होना केंद्र सरकार को मृत्युदंड दिए जाने की प्रक्रिया की व्यापक समीक्षा करने से नहीं रोकता। सरकार विशेषज्ञों की समिति गठित कर यह अध्ययन करा सकती है कि क्या फांसी के अलावा कोई ऐसा तरीका उपलब्ध है, जिससे मृत्युदंड की प्रक्रिया में दर्द और पीड़ा को न्यूनतम रखते हुए दोषी की गरिमा भी बरकरार रखी जा सके।
नए वैज्ञानिक सबूत आने पर फिर हो सकती है सुनवाई
अदालत ने भविष्य के लिए इस मुद्दे को पूरी तरह बंद नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर आगे चलकर ठोस मेडिकल या वैज्ञानिक प्रमाण सामने आते हैं, जिनसे यह पता चले कि फांसी की मौजूदा प्रक्रिया में अत्यधिक दर्द या पीड़ा होती है और संवैधानिक समीक्षा की जरूरत है, तो इस विषय को दोबारा अदालत के सामने लाया जा सकता है।
CrPC की धारा 354(5) को दी गई थी चुनौती
यह जनहित याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर की गई थी। इसमें दंड प्रक्रिया संहिता यानी CrPC की धारा 354(5) को चुनौती दी गई थी। इस प्रावधान के तहत मौत की सजा पाए कैदी को गर्दन से तब तक फांसी पर लटकाने का प्रावधान है, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए। याचिकाकर्ता ने इस प्रक्रिया को दर्दनाक बताते हुए वैकल्पिक व्यवस्था की मांग की थी।
फांसी की जगह कई विकल्प सुझाए गए
याचिका में फांसी के स्थान पर इंट्रावीनस लेथल इंजेक्शन, गोली मारने, इलेक्ट्रोक्यूशन और गैस चैंबर जैसे विकल्पों पर विचार करने का सुझाव दिया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मौजूदा फांसी की प्रक्रिया में कुछ परिस्थितियों में दोषी को लंबे समय तक शारीरिक पीड़ा का सामना करना पड़ सकता है। इसी आधार पर धारा 354(5) को संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ बताते हुए चुनौती दी गई थी।
गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार का भी मुद्दा
याचिका में यह मांग भी की गई थी कि मृत्युदंड के निष्पादन के दौरान गरिमा और कम से कम पीड़ा सुनिश्चित करने के सिद्धांत को मौलिक अधिकारों के संदर्भ में देखा जाए। याचिकाकर्ता ने अदालत से फांसी के मौजूदा तरीके को असंवैधानिक घोषित करने और अधिक मानवीय विकल्प तलाशने के निर्देश देने का आग्रह किया था।
2023 में विशेषज्ञ समिति पर हुआ था विचार
इस मामले की सुनवाई के दौरान मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा देने के तरीके की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की संभावना पर विचार किया था। अदालत ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से फांसी के दौरान होने वाले प्रभाव, संभावित दर्द, मृत्यु में लगने वाले समय और प्रक्रिया के लिए उपलब्ध संसाधनों से जुड़ी जानकारी जुटाने को कहा था।
अटॉर्नी जनरल ने समिति की सिफारिश बताई थी
मई 2023 में अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया था कि उन्होंने मृत्युदंड लागू करने के बेहतर विकल्पों पर विचार के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की सिफारिश की है। उस समय केंद्र सरकार समिति में शामिल किए जाने वाले विशेषज्ञों और इसके स्वरूप पर विचार कर रही थी। मौजूदा सुनवाई में भी केंद्र की ओर से इस विषय पर उच्च स्तर पर विचार किए जाने की जानकारी दी गई।
लेथल इंजेक्शन को लेकर भी उठे सवाल
पिछली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने फांसी के स्थान पर लेथल इंजेक्शन को संभावित विकल्प के रूप में अपनाने की वकालत की थी। यह सुझाव भी दिया गया था कि दोषी को फांसी और लेथल इंजेक्शन में से किसी एक विकल्प को चुनने का अवसर दिया जा सकता है। हालांकि, प्रोजेक्ट 39A ने दूसरे देशों के अनुभवों का हवाला देते हुए बताया कि लेथल इंजेक्शन भी पूरी तरह त्रुटिरहित तरीका नहीं है।
जल्लादों पर मनोवैज्ञानिक असर का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान संभावित वैकल्पिक तरीकों और उनके वैज्ञानिक पहलुओं पर चर्चा हुई। जस्टिस संदीप मेहता ने फांसी की सजा लागू करने वाले जल्लादों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव का भी उल्लेख किया। अदालत के सामने यह सवाल भी रहा कि मृत्युदंड की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें दोषी की गरिमा और अनावश्यक पीड़ा दोनों को ध्यान में रखा जाए।
केंद्र सरकार कर रही है उच्च स्तर पर समीक्षा
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पहले सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि केंद्र सरकार इस संवेदनशील विषय पर उच्चतम स्तर पर विचार कर रही है। इसके लिए कुछ समितियां भी गठित की गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद फांसी की मौजूदा व्यवस्था फिलहाल कायम रहेगी, लेकिन भविष्य में नए वैज्ञानिक प्रमाण सामने आने या सरकार की व्यापक समीक्षा के आधार पर इस प्रक्रिया में बदलाव की संभावना का रास्ता खुला रहेगा।
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