प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर दिल्ली हाईकोर्ट ने 25 अगस्त को अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) द्वारा दिए गए उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी को वर्ष 1978 में बीए की परीक्षा देने वाले सभी छात्रों के रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की अनुमति दी गई थी।

कोर्ट ने कहा कि इस तरह की जानकारी गोपनीय होती है और इसे किसी व्यक्ति की सहमति के बिना साझा नहीं किया जा सकता। यह मामला तब शुरू हुआ जब एक आरटीआई याचिका के माध्यम से दिल्ली यूनिवर्सिटी से साल 1978 में बीए की परीक्षा देने वाले सभी छात्रों की सूची और उनकी शैक्षणिक जानकारी मांगी गई। सूचना आयोग ने इस याचिका को मंजूरी देते हुए यूनिवर्सिटी को आदेश दिया था कि वह सभी संबंधित रिकॉर्ड मुहैया कराए। इसी साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी, जिससे मामला और ज्यादा चर्चित हो गया।

व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक करना निजता का हनन
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी जानकारी निजी होती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत भी जब तक कोई ठोस सार्वजनिक हित न हो, तब तक इस तरह की जानकारी साझा नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह निर्णय निजता के अधिकार और व्यक्तिगत गोपनीयता के संवैधानिक महत्व को ध्यान में रखते हुए सुनाया।
दिल्ली यूनिवर्सिटी की याचिका पर आया फैसला
दिल्ली यूनिवर्सिटी ने केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। यूनिवर्सिटी का कहना था कि इस तरह के आदेश से छात्रों की निजता का उल्लंघन होगा और यह विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड सिस्टम पर भी सवाल खड़े करता है। कोर्ट ने यूनिवर्सिटी की दलीलों को स्वीकार करते हुए CIC के आदेश को असंवैधानिक और अस्वीकार्य करार दिया।
डिग्री विवाद बना राजनीतिक मुद्दा
प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री को लेकर विपक्षी दलों द्वारा समय-समय पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। यह मुद्दा कई बार चुनावी राजनीति का भी हिस्सा बना। लेकिन अब दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले से विवाद को कानूनी रूप से विराम मिल सकता है। कोर्ट ने निजता और गोपनीयता को प्राथमिकता देते हुए साफ कर दिया है कि शैक्षणिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती जब तक कोई विशेष कारण न हो।
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री से जुड़े विवाद में अहम माना जा रहा है, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत जानकारी और निजता का उल्लंघन सूचना के अधिकार के तहत भी नहीं किया जा सकता। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी उदाहरण बन सकता है।










