Diwali 2026 : रोशनी और खुशियों का त्योहार दिवाली 8 नवंबर 2026, रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन देशभर में लोग अपने घरों को दीपों, रंगोली और फूलों से सजाते हैं। शाम के समय शुभ मुहूर्त में मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दिवाली की रात मां लक्ष्मी घर में पधारती हैं और भक्तों को सुख, शांति तथा समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। लेकिन दिवाली से जुड़ी एक ऐसी लोकपरंपरा भी है, जो अगले दिन सुबह निभाई जाती है।
क्या है सूप पीटने या दरिद्र निकालने की परंपरा?
दिवाली के अगले दिन सुबह घर से दरिद्रता को बाहर निकालने के प्रतीक के रूप में सूप पीटने की रस्म निभाई जाती है। इसे ‘दरिद्र निकालना’ भी कहा जाता है। यह परंपरा खासतौर पर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों में प्रचलित है। इसमें घर की महिलाएं या परिवार के बुजुर्ग बांस के सूप को पीटते हुए घर के अलग-अलग हिस्सों में घूमते हैं।

सूप को दरिद्रता दूर करने का प्रतीक क्यों माना जाता है?
परंपरागत रूप से सूप का इस्तेमाल अनाज से भूसी और दूसरी अवांछित चीजों को अलग करने के लिए किया जाता है। इसी वजह से लोकमान्यताओं में सूप को अन्न, शुद्धि और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि जिस तरह सूप अनाज से बेकार चीजों को अलग करता है, उसी तरह इसे पीटने की रस्म घर से दरिद्रता, नकारात्मकता और परेशानियों को दूर करने का प्रतीक है।

सूप पीटते समय महिलाएं बोलती हैं ये पारंपरिक वाक्य
इस रस्म के दौरान महिलाएं लकड़ी की डंडी, संठी या लोहे की किसी वस्तु से सूप को पीटती हैं। साथ ही कुछ पारंपरिक शब्द भी बोलती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इनके बोलने का तरीका बदल सकता है। आमतौर पर ये वाक्य सुनने को मिलते हैं:
- ‘दरिद्र भाग जा, लक्ष्मी घर आ।’
- ‘दलिदर बाहर, लक्ष्मी अंदर।’
- ‘ईश्वर बैठे, दरिद्र निकले।’
- ‘अलक्ष्मी दूर जा, लक्ष्मी घर आ।’
दिवाली के बाद कितने बजे निभाई जाती है यह रस्म?
स्थानीय परंपराओं के अनुसार, सूप पीटकर दरिद्रता निकालने की रस्म दिवाली के अगले दिन सूर्योदय से पहले निभाई जाती है। कई इलाकों में इसे ब्रह्म मुहूर्त के दौरान करने की मान्यता है। कुछ परिवारों में सुबह लगभग 3:30 से 4 बजे के बीच इसकी शुरुआत की जाती है। हालांकि, इसका समय हर क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है।

कैसे पूरी की जाती है सूप पीटने की रस्म?
सबसे पहले घर के सदस्य सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि की तैयारी करते हैं। इसके बाद पुराना या अनुपयोगी बांस का सूप लिया जाता है। लकड़ी की डंडी, संठी या लोहे की वस्तु से इसे पीटते हुए घर के कमरों, आंगन और मुख्य दरवाजे तक ले जाया जाता है। इस दौरान पारंपरिक वाक्य बोले जाते हैं।
रस्म पूरी होने के बाद इस्तेमाल किए गए सूप को घर से बाहर रख दिया जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे गांव या मोहल्ले की सीमा के बाहर छोड़ने की परंपरा भी है। इसके बाद घर की सफाई की जाती है। कुछ परिवार मुख्य द्वार पर दीपक जलाते हैं और गंगाजल का छिड़काव भी करते हैं।
सूप पीटने की रस्म के पीछे क्या है धार्मिक मान्यता?
लोकविश्वास के अनुसार, दिवाली की रात मां लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है और अगली सुबह दरिद्रता को प्रतीकात्मक रूप से घर से बाहर किया जाता है। माना जाता है कि इस परंपरा से परिवार में सुख-शांति, धन-धान्य और समृद्धि बनी रहती है। यह रस्म धार्मिक आस्था और क्षेत्रीय लोकसंस्कृति से जुड़ी है।

